विश्व धरोहर दिवस: लखनऊ की जुबां, जायका और इमारतें… क्यों हैं पूरी दुनिया में खास?
Lucknow News: जानिए लखनऊ की अनमोल विरासत के बारे में। UNESCO ‘सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ लखनऊ के कबाब, ऐतिहासिक रूमी दरवाज़ा और यहाँ की ‘पहले आप’ वाली तहजीब की पूरी कहानी यहाँ पढ़ें।
Lucknow News: ‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’, यह सिर्फ एक जुमला नहीं, बल्कि इस शहर की रूह है। विश्व धरोहर दिवस (World Heritage Day) के अवसर पर उत्तर प्रदेश की राजधानी अपनी अनमोल विरासत का जश्न मना रही है। यूनेस्को (UNESCO) द्वारा ‘सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी‘ का खिताब पाने के बाद अब लखनऊ की पहचान सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहाँ के स्वाद और तहजीब को भी वैश्विक मान्यता मिल चुकी है।
“पहले आप” वाली तहजीब
लखनऊ की सबसे बड़ी विरासत यहाँ की भाषा और अदब है। इतिहासकार बताते हैं कि यहाँ की ‘नफासत’ (शुद्धता) और बातचीत का सलीका दुनिया में कहीं और नहीं मिलता। “अदब और आदाब” यहाँ की मिट्टी में रचे-बसे हैं। यह शहर सिखाता है कि विरासत सिर्फ पत्थर की इमारतों में नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार और रिश्तों के सम्मान में भी होती है।
स्वाद का वैश्विक केंद्र
पिछले वर्ष नवंबर में यूनेस्को ने लखनऊ को खान-पान की विविधता के लिए सम्मानित किया। यहाँ के खान-पान की कुछ खास बातें:
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शीरमाल और बाकरखानी: पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन की किताब ‘आपका लखनऊ’ के अनुसार, ईरान और अफगानिस्तान से आए कुलचे को लखनऊ के कारीगरों ने दूध और मैदे के मेल से ‘शीरमाल’ का नया रूप दिया।
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कबाब और बिरयानी: नहारी-कुलचा, टुंडे कबाब और मख्खन मलाई का स्वाद लेने बॉलीवुड सितारे जैसे सिद्धार्थ मल्होत्रा और जाह्नवी कपूर भी यहाँ खिंचे चले आते हैं।
चूने की नक्काशी में संगमरमर जैसी चमक
लखनऊ की इमारतें इंडो-इटालियन और यूरोपीय वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण हैं। यहाँ की कुछ प्रमुख धरोहरें:
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बड़ा इमामबाड़ा: इसकी छतें बिना किसी बीम के टिकी हैं, जो इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है।
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छतर मंज़िल और कोठी दर्शन विलास: नवाब नासिरुद्दीन हैदर के काल में बनी ये इमारतें अपनी भव्यता के लिए जानी जाती हैं।
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कारीगरी का रहस्य: पुराने समय में छतों पर जो नक्काशी की जाती थी, वह संगमरमर नहीं बल्कि शंख, सीप के पाउडर और चूने का मिश्रण होती थी, जो आज भी शीशे की तरह चमकती है।
क्यों मनाया जाता है यह दिवस?
दुनियाभर की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 18 अप्रैल 1982 को पहली बार विश्व धरोहर दिवस मनाने की घोषणा की गई थी, जिसे 1983 में यूनेस्को ने पूर्ण मान्यता दी।





