कागजों में सुधरी हवा, जमीनी हकीकत कुछ और… प्रदूषण पर सरकार के दावों की खुली पोल

Delhi Pollution: चार दिसंबर को राज्यसभा में सरकार ने दावा किया कि 2025 में दिल्ली की एयर क्वॉलिटी में सुधार हुआ है और अच्छे AQI वाले दिनों की संख्या 2016 के 110 से बढ़कर 200 हो गई है। आंकड़े राहत देने वाले दिखते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। दिल्ली-एनसीआर के हजारों परिवारों का कहना है कि रोजमर्रा की जिंदगी में हवा की गुणवत्ता बेहतर होती महसूस नहीं हो रही।

प्रदूषण के कारण दिल्ली छोड़ने को मजबूर परिवार
इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर में कार्यरत प्रीति श्रीवास्तव बताती हैं कि उनकी आठ साल की बेटी को हर सर्दी प्रदूषण के कारण सांस की गंभीर दिक्कत होने लगती थी। डॉक्टरों की सलाह पर बच्ची को सुरक्षित रखने के लिए कुछ महीनों के लिए दिल्ली से बाहर भेजना पड़ा। मजबूरी में उसे रांची भेजा गया और वहीं स्कूल में दाखिला भी कराया गया। यह कहानी अकेली नहीं है—ऐसे कई परिवार हैं जिन्हें बच्चों की सेहत के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा।

बुजुर्गों की ‘घर में कैद’ जिंदगी
दिल्ली की सुरभि के 96 वर्षीय पिता जे. एम. कपूर लंबे समय से सांस और दिल की बीमारी से जूझ रहे हैं। पिछले साल उन्हें गोवा भेजा गया था, लेकिन इस साल डॉक्टर के पास रहने की जरूरत के कारण वे दिल्ली में ही रहने को मजबूर हैं। एयर प्यूरीफायर और नेबुलाइजर अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं, फिर भी खतरा टला नहीं है।

गर्भ में पल रहे बच्चों पर गंभीर असर
IIT दिल्ली सहित कई प्रमुख संस्थानों की हालिया स्टडी में सामने आया है कि जब पीएम 2.5 का स्तर 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ऊपर जाता है, तो हर अतिरिक्त 10 माइक्रोग्राम बढ़ने पर कम वजन वाले बच्चों की दर 5 फीसदी और प्रीमैच्योर डिलीवरी की दर 12 फीसदी तक बढ़ जाती है। यह संकेत आने वाली पीढ़ी के लिए गहरी चिंता पैदा करता है।

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आपातकाल जैसे हालात
सरकारी दावों से विशेषज्ञ भी सहमत नहीं हैं। AIIMS दिल्ली के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. अनंत मोहन ने नवंबर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि दिल्ली में प्रदूषण के कारण इमरजेंसी जैसे हालात हैं। प्रदूषण का स्तर इतना खतरनाक है कि सामान्य वायरल संक्रमण के मरीजों को भी ठीक होने में पहले से कहीं ज्यादा समय लग रहा है।

हवा में तैरता माइक्रोप्लास्टिक
एक वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि राजधानी की हवा में इनहेलेबल माइक्रोप्लास्टिक्स की मात्रा 14.18 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पाई गई है। बाजारों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में एक क्यूबिक मीटर हवा में औसतन 38 प्लास्टिक कण मौजूद हैं। IISER और AIIMS कल्याणी के वैज्ञानिकों के अनुसार, ये सूक्ष्म कण शरीर से बाहर नहीं निकलते और फेफड़ों में सूजन, दमा, एलर्जी, हार्मोनल गड़बड़ी और लंबे समय में कैंसर तक का खतरा बढ़ा सकते हैं।

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अस्पतालों में बढ़ते सांस के मरीज
सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि पिछले तीन वर्षों में दिल्ली के छह बड़े केंद्रीय अस्पतालों की इमरजेंसी में सांस संबंधी गंभीर मामलों में भारी वृद्धि हुई है। इस दौरान 2,04,758 मरीज एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन जैसी शिकायतों के साथ पहुंचे, जिनमें से 30,425 को भर्ती करना पड़ा।

जानलेवा बनता प्रदूषण
Institute of Health Metrics and Evaluation की अक्टूबर रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में दिल्ली में 17,188 मौतें प्रदूषण से जुड़ी थीं—यानी हर सात में से एक मौत जहरीली हवा के कारण हुई। वहीं Centre for Research on Energy and Clean Air के विश्लेषण के मुताबिक, 2023 में दिल्ली में हुई कुल मौतों में से लगभग 15 प्रतिशत प्रदूषण से संबंधित थीं।

सरकारी आंकड़ों और आम लोगों के अनुभव के बीच गहरी खाई है। जब तक बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों को खुलकर सांस लेने का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक अच्छे AQI के दावे सिर्फ कागज़ी ही रहेंगे।

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