
आसाम का मानस नेशनल पार्क: मौत के साए से उभरकर पुनर्जीवन की अनोखी मिसाल
Manas National Park: असम के घने और रहस्यमयी जंगलों के बीच बसा मानस नेशनल पार्क कभी भारत की धरोहर का गर्व था। लेकिन 1990 के दशक में हालात इस कदर बिगड़े कि यह अद्भुत पार्क अपने वजूद के लिए जूझने लगा। अवैध शिकार, हथियारों की पहुंच, उग्रवादी संघर्ष और प्रशासनिक कमजोरी ने मानस को धीरे-धीरे खोखला कर दिया। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि यूनेस्को ने 1992 में इसे ‘खतरे में पड़ी विश्व धरोहर’ की सूची में डाल दिया। विशेषज्ञों को डर था कि मानस अब कभी अपने पुराने रूप में नहीं लौट पाएगा।
लेकिन जंगल की मिट्टी में छिपी उम्मीद का बीज पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था—और यही उम्मीद आगे चलकर एक बड़े बदलाव में बदल गई।
खतरे में क्यों था मानस?
1990 के दशक में बोड़ो आंदोलन की अशांति ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया।
- स्थानीय समुदायों का ध्यान जंगल से हट गया।
- कई लोग शिकार और अवैध स्मगलिंग में शामिल हो गए।
- हथियारों की भरमार और कानून-व्यवस्था की कमजोरी ने संकट और गहरा कर दिया।
वन्यजीव तेजी से गायब होने लगे—हाथी, हिरण, जंगली सूअर और खासकर गेंडे लगभग मिटने की कगार पर पहुंच गए।
हिंसा, प्राकृतिक आपदाएं, प्रदूषण और अनियंत्रित पर्यटन ने मिलकर मानस की जीवन रेखा को लगभग तोड़ दिया।
बदलाव की किरण: जब लोगों ने जंगल को अपनाया
2003 इस कहानी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसी वर्ष मानस माओज़िगेंद्री इकोटूरिज़्म सोसाइटी (MMES) का गठन हुआ, जिसने समुदायों के बीच जागरूकता और संरक्षण का बीड़ा उठाया।
इस पहल की खास बातें—
- शिकार करने वालों को ही कंजर्वेशनिस्ट बनाया गया।
- गांव-गांव जाकर बताया गया कि जंगल बचेगा तो जीवन बचेगा।
- बोड़ोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) ने अवैध हथियार छुड़वाने में अहम भूमिका निभाई।
2003–2008 के बीच 60 से अधिक बंदूकें जमा कराई गईं, और कई शिकारी संरक्षण की राह पर लौट आए।
शिकारी से संरक्षक तक: एक अनोखा बदलाव
भुदिस्वर बोरो जैसे कई लोग, जिनके नाम पहले बड़े शिकारी के रूप में जाने जाते थे, अब वन्यजीवों की सुरक्षा में अग्रणी हैं।
- वे हाथियों और गैंडों की रक्षा में स्वयंसेवक हैं।
- गांव के बच्चों को प्रकृति की शिक्षा दी जाती है।
- महिलाओं को बुनाई, हस्तशिल्प और पशुपालन का प्रशिक्षण देकर आर्थिक रूप से सक्षम बनाया गया।
धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में यह विश्वास मजबूत हुआ कि जंगल बचाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं—यह समुदाय की पहचान और भविष्य से जुड़ा है।
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जंगल में फिर लौटी जिंदगी
कई सालों की मेहनत के बाद आज मानस नेशनल पार्क फिर से जीवन से भर उठा है।
यहां आज—
- 60 मैमल (स्तनधारी)
- 42 रैप्टाइल्स (सरीसृप)
- 500 से ज्यादा पक्षियों की प्रजातियां
पाई जाती हैं, जिनमें 26 वैश्विक रूप से संकटग्रस्त (Endangered) हैं।
समुदाय अब—
- स्वयं पेट्रोलिंग करता है,
- पर्यटकों के लिए होमस्टे चलाता है,
- मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में मदद करता है।
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मानस का नया चेहरा: विश्व के लिए एक सीख
आज मानस सिर्फ एक राष्ट्रीय उद्यान नहीं, बल्कि यह साबित करता है कि अगर समुदाय, प्रशासन और संरक्षण मिलकर काम करें, तो एक मरता हुआ जंगल भी फिर से हरा-भरा हो सकता है।
मानस की यह यात्रा एक प्रेरणा है—
कि प्रकृति की रक्षा तब सबसे अधिक सफल होती है, जब उसे सबसे ज़्यादा प्यार और जिम्मेदारी वहीं से मिलती है, जहां उसका असली घर है—अपने लोगों से।
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