फसल बीमा के नाम पर बड़ा खेल… बिना नुकसान बांट दिया गया करोड़ों का मुआवजा

PM Fasal Bima Yojana: बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को मिली मुआवजा राशि अब राहत नहीं बल्कि विवाद और जांच का कारण बन गई है। जिन गांवों में किसानों के बैंक खातों में अचानक बड़ी रकम पहुंची, वहीं से इस पूरे प्रकरण पर सवाल खड़े होने लगे। शुरुआत में किसानों को यह समझ नहीं आया कि बिना किसी आवेदन या सूचना के उनके खातों में बीमा की रकम कैसे पहुंच गई, लेकिन जल्द ही यह मामला प्रशासनिक गड़बड़ी और कथित फर्जीवाड़े की ओर इशारा करने लगा।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कुछ सरकारी कर्मचारियों और खुद को बीमा एजेंट बताने वाले लोगों ने किसानों से मुआवजा राशि में हिस्सेदारी की मांग शुरू कर दी। कई किसानों ने इसका खुलकर विरोध किया, जिसके बाद गांवों में तनाव और टकराव की स्थिति बन गई।

जहां फसल सुरक्षित, वहां भी बीमा भुगतान
जांच में सामने आया कि कई गांवों में फसलों को कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ था। इसके बावजूद उन गांवों के किसानों को बीमा मुआवजा दे दिया गया। कई किसानों का कहना है कि उन्होंने न तो फसल बीमा के लिए कोई दावा किया था और न ही किसी तरह के सर्वे या निरीक्षण की जानकारी उन्हें दी गई थी। इसके बावजूद उनके खातों में हजारों से लेकर लाखों रुपये तक की राशि ट्रांसफर कर दी गई।

चरखारी क्षेत्र के कुछ गांवों में किसानों ने जब अधिकारियों से इस भुगतान का आधार जानने की कोशिश की, तो उन्हें कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। आरोप है कि लेखपालों द्वारा फसल क्षति का आकलन वास्तविक स्थिति से कई गुना अधिक दिखाया गया, जिसके आधार पर बीमा कंपनियों ने भुगतान को मंजूरी दे दी।

बिचौलियों की सक्रियता और हिस्सेदारी की मांग
मुआवजा राशि मिलते ही कथित बीमा एजेंटों और स्थानीय बिचौलियों की गतिविधियां तेज हो गईं। किसानों का आरोप है कि इन लोगों ने दावा किया कि उन्हीं के प्रयासों से बीमा राशि मिली है और अब उसमें हिस्सा देना होगा। कुछ मामलों में किसानों से 30 से 40 प्रतिशत तक की मांग किए जाने के आरोप लगे हैं।

पनवाड़ी क्षेत्र के नटर्रा गांव में हालात उस समय बिगड़ गए जब मुआवजे के बंटवारे को लेकर किसानों और बिचौलियों के बीच झड़प हो गई। वहीं दूसरी ओर, जिन किसानों को बीमा की राशि नहीं मिली, उन्होंने भी प्रशासन पर चयन में गड़बड़ी और पक्षपात के आरोप लगाए।

शिकायतों के बाद प्रशासन पर बढ़ा दबाव
लगातार मिल रही शिकायतों और बढ़ते विरोध के बाद जिला प्रशासन को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। किसान संगठनों के अनुसार, जब जिले में वितरित की गई बीमा राशि का आंकड़ा सामने आया, तो प्रशासनिक स्तर पर कई बैठकें की गईं। इन बैठकों में जब यह सवाल उठा कि भुगतान किन आधारों पर और किन किसानों को किया गया, तो कई अधिकारी जवाब देने से बचते नजर आए।

इसके बाद भूमि अभिलेखों, फसल सर्वे रिपोर्ट और बीमा दावों की जांच का फैसला लिया गया, जिससे पूरे मामले में गड़बड़ी की आशंका और गहरी हो गई।

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झांसी से सामने आया अहम मामला
इस पूरे प्रकरण को नया मोड़ झांसी जिले से मिली एक शिकायत ने दिया। यहां एक किसान के घर पहुंचे कथित बीमा कर्मी ने मुआवजा राशि में हिस्सा मांगा। किसान ने जब उससे उसकी पहचान और अधिकार पूछे, तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसके बाद किसान ने कृषि विभाग में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

मामले की जांच उप संभागीय कृषि अधिकारी को सौंपी गई। सितंबर 2025 में तैयार की गई जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि रबी सीजन 2024 के दौरान जिन क्षेत्रों में मुआवजा बांटा गया, वहां वास्तविक फसल नुकसान बेहद सीमित था।

जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य
जांच रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश स्तर पर रबी फसलों की वास्तविक क्षति 10 प्रतिशत से अधिक नहीं पाई गई, जबकि स्थानीय स्तर पर तैयार रिपोर्टों में इसे 60 प्रतिशत तक दर्शाया गया। इसी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई क्षति के आधार पर लाखों रुपये का मुआवजा किसानों के खातों में भेज दिया गया। रिपोर्ट में पूरे मामले की विस्तृत और उच्चस्तरीय जांच की सिफारिश की गई है।

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झांसी में तहसीलवार जांच तेज
लखनऊ से मिली जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत खरीफ 2024 और रबी 2024-25 में बिना भूमि स्वामित्व वाले गैर-ऋणी किसानों द्वारा मुआवजा लेने की शिकायतों के बाद झांसी जिले में प्रशासन ने सख्ती बढ़ा दी है। जिलाधिकारी के निर्देश पर तहसीलवार जांच टीमों का गठन किया गया है।

इन टीमों को सात दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। प्राथमिक जांच उन गांवों में की जा रही है, जहां चकबंदी के बाद भी भूमि रिकॉर्ड का एकीकरण पूरा नहीं हो सका है।

कार्रवाई की आशंका
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि जांच में फर्जीवाड़ा या जानबूझकर गलत आकलन की पुष्टि होती है, तो दोषी कर्मचारियों, बिचौलियों और संबंधित बीमा एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। वहीं किसान संगठनों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को सजा मिले, ताकि भविष्य में योजना का दुरुपयोग रोका जा सके।

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