
अंबेडकर पर विवादित टिप्पणी…मायावती ने साधु-संतों को दी चुप रहने की सलाह
Mayawati on Rambhadracharya: तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी रामभद्राचार्य के मनुस्मृति और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर पर दिए गए विवादित बयान ने देश में राजनीतिक उबाल मचा दिया है। उन्होंने एक निजी चैनल के कार्यक्रम में कहा कि मनुस्मृति देश का पहला संविधान है और इसमें ऐसी कोई भी पंक्ति नहीं है जो भारतीय संविधान के खिलाफ हो। उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर अंबेडकर जी संस्कृत जानते होते, तो मनुस्मृति को जलाने की गलती नहीं करते।
स्वामी रामभद्राचार्य के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया आई है। इस मुद्दे पर बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने शनिवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कड़ा एतराज जताया। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के भारतीय संविधान के निर्माण में अतुल्य योगदान के बारे में सही जानकारी नहीं रखने वाले कुछ साधु-संतों को विवादित बयानबाजी से बचना चाहिए। मायावती ने लिखा कि ऐसे लोगों को यदि वे चुप रहें तो यह उचित होगा।
मायावती ने आगे कहा कि बाबा साहेब के अनुयायी मनुस्मृति का विरोध क्यों करते हैं, इसे भी साधु-संतों को जातिवादी द्वेष की भावना से ऊपर उठकर समझना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अंबेडकर एक महान विद्वान और व्यक्तित्व थे, और कोई भी साधु-संत उनके विद्वता के मामले में उन्हें परख नहीं सकता। इसलिए इस मामले में टिप्पणी करने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है।
स्वामी रामभद्राचार्य के बयान के बाद राजनीतिक दलों और अंबेडकर परिवार के लोगों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। राजद, बसपा और अंबेडकर के पोते इस बयान की निंदा करते हुए इसे गलत ठहराने में जुट गए हैं। यह बयान सोशल मीडिया और जनसामान्य के बीच भी चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल साधु-संत और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और संवैधानिक बहस का भी हिस्सा बन गया है। देश में संविधान और उसकी स्थापना के पीछे अंबेडकर की भूमिका को लेकर यह बहस कई सामाजिक और राजनीतिक स्तरों पर चल रही है।
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इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की राजनीति किस हद तक संवैधानिक मूल्यों और इतिहास की समझ से जुड़ी हो सकती है।
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