
CIC लिस्ट पर राहुल गांधी के दावे पर विवाद… डेटा ने दिखाया अलग सच
New Delhi: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ हुई बैठक में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों को लेकर खुद की आपत्ति दर्ज कराई। राहुल ने बैठक में आरोप लगाया कि संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं में OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक वर्गों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है।
बैठक लगभग 88 मिनट तक चली, जिसमें विशेष रूप से मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति द्वार राष्ट्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा हुई।
CIC में रिक्त पदों की गंभीर स्थिति
केंद्रीय सूचना आयोग एक वैधानिक संस्था है, जो सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत नागरिकों को सरकारी जानकारी दिलाने की भूमिका निभाती है। आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और अधिकतम 10 सूचना आयुक्त होते हैं।
हालिया स्थिति के अनुसार:
- CIC सहित 8 पद फिलहाल रिक्त हैं।
- आयोग में केवल दो ही सूचना आयुक्त—अनंदी रामलिंगम और विनोद कुमार तिवारी—कार्यरत हैं।
- आयोग के पास लगभग 30,838 लंबित मामले हैं, जो प्रशासनिक कार्य में देरी का संकेत हैं।
नियुक्ति पैनल में राहुल गांधी की भूमिका
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति बनाई जाती है, जिसमें:
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
2. एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री
3. नेता प्रतिपक्ष (राहुल गांधी)
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रपति अधिकारी नियुक्त करते हैं। राहुल गांधी ने इस बैठक में अपने पद के नाते आयोग में नियुक्तियों पर अपनी शिकायत और मुद्दा उठाया।
आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधित्व पर राहुल की आपत्ति
राहुल गांधी ने कहा कि स्पर्धात्मक नियुक्तियों में दलित, आदिवासी, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व नगण्य संख्या में है, जिससे संवैधानिक संस्थाओं में और लोकतांत्रिक ढांचे में असंतुलन पैदा हो रहा है।
उन्होंने बैठक में कहा कि:
“संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं में देश की 90 प्रतिशत आबादी को व्यवस्थित रूप से बाहर रखा जा रहा है।”
राहुल का यह तर्क इस बात पर आधारित था कि पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों को अब तक पर्याप्त अवसर नहीं मिले हैं।
इतिहास और वास्तविक नियुक्ति रिकॉर्ड
केंद्रीय सूचना आयोग की स्थापना 2005 में हुई थी। उस समय और उसके बाद नियुक्तियों का रिकॉर्ड बेहद महत्वपूर्ण है:
- 2005–2014 (UPA शासन): सूचना आयोग में SC/ST समुदाय से किसी भी सदस्य की नियुक्ति नहीं हुई थी, न ही अध्यक्ष के रूप में और न ही सदस्य के रूप में।
- 2014 के बाद NDA शासन:
* 2018 में पहली बार ST समुदाय से सुरेश चंद्रा को सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया।
* 2020 में SC समुदाय के हीरालाल सामरिया को सूचना आयुक्त बनाया गया।
* बाद में 2023 में हीरालाल सामरिया को ही मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) का पद भी मिला।
मौजूदा रिक्त पदों पर सिफारिशों पर चर्चा करते हुए सूत्रों ने बताया कि 8 रिक्त पदों में से 5 पदों पर वंचित वर्गों के नामों की सिफारिश की गई है। इनमें शामिल हैं:
- एक अनुसूचित जाति (SC)
- एक अनुसूचित जनजाति (ST)
- एक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
- एक अल्पसंख्यक प्रतिनिधि
- एक महिला प्रतिनिधि
इसका मतलब है कि रिक्त पदों के लिए पेश किए गए नामों में वंचित वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व पहले ही प्रस्तावित है, जिससे राहुल गांधी के “90 प्रतिशत आबादी बाहर है” वाले दावे पर सवाल खड़ा होता है।
पिछले दौर के विरोध और विवाद
यह पहला मौका नहीं है जब सूचना आयोग की नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आया हो।
- 2023 में हीरालाल सामरिया की नियुक्ति पर भी विपक्ष ने असहमति जताई थी।
- तब चयन समिति की बैठक में विपक्षी सदस्य अधीर रंजन चौधरी ने आरोप लगाया था कि नियुक्ति प्रक्रिया में उनसे सलाह या जानकारी नहीं ली गई।
- 2020 में भी विपक्षी सदस्य ने यशवर्धन कुमार सिन्हा और पत्रकार उदय महूरकर की नियुक्ति का विरोध दर्ज कराया था, लेकिन नियुक्तियां कर दी गई थीं।
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राहुल गांधी के संवैधानिक अधिकार और भूमिका
नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी के पास कई संवैधानिक कार्यों में सशक्त अधिकार हैं। वे भारत के कई उच्चस्तरीय पदों पर नियुक्ति में मुख्य पैनलों के सदस्य हैं, जिनमें शामिल हैं:
- चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य चुनाव आयोग के सदस्य
- सीबीआई/ईडी के डायरेक्टर
- सेंट्रल विजिलेंस कमिशन
- सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमिशन
- NHRC प्रमुख
- लोकपाल
इन समितियों में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, इसलिए नियुक्तियों के फैसलों में प्रधानमंत्री को नेता प्रतिपक्ष की सहमति जरूरी होती है। राहुल गांधी लोक लेखा समिति के भी अध्यक्ष हैं, जो सरकार के खर्चों और प्रशासनिक कामकाज की निरंतर समीक्षा करती है।
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नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल का संवैधानिक पद
राहुल गांधी को 25 जून, 2024 को नेता प्रतिपक्ष घोषित किया गया। यह उनके 20 साल के राजनीतिक करियर में पहला संवैधानिक पद है। वे इस पद पर रहने वाले गांधी परिवार के तीसरे सदस्य हैं।
- इससे पहले उनके पिता राजीव गांधी (1989–90) और मां सोनिया गांधी (1999–2004) इसी पद पर रह चुकी हैं।
इसके अलावा, 2024 चुनाव से पहले 10 साल तक लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त रहा। 2014 और 2019 में विपक्ष के पास आवश्यक न्यूनतम संख्या (10% सीटें) नहीं थी। 2024 के चुनाव में कांग्रेस 99 सीटों के साथ सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी।
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