कफ सिरप कांड पर छलका पिता का दर्द; बच्चा बचा लेकिन अँधेरे में…

Chhindwara Toxix Cough Syrup: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आई जहरीले कफ सिरप की त्रासदी ने एक परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी है। 116 दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद पांच साल का मासूम तो बच गया, लेकिन वह हमेशा के लिए अपनी आंखों की रोशनी खो चुका है। बेटे को इस हालत में देखकर पिता का दर्द छलक पड़ा—“मेरा बेटा बच गया, लेकिन अब वह देख नहीं सकता।”

“बेटा बचा, लेकिन अंधेरे में लौट आया”
36 वर्षीय टिक्कू यादववंशी की आवाज बेटे की हालत बताते हुए भर्रा जाती है। उनका कहना है कि जहरीला कफ सिरप पीने के बाद उनका बेटा महीनों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा। अब जब वह घर लौटा है, तो न सिर्फ उसकी दृष्टि चली गई है, बल्कि वह ठीक से चल-फिर भी नहीं पाता। पिता कहते हैं, “मैं उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ सकता। ऐसे में काम पर कैसे जाऊं—यही सबसे बड़ा सवाल है।”

कफ सिरप कांड के कुछ गिने-चुने बचे बच्चों में शामिल
यह बच्चा उन चंद बच्चों में से है, जो छिंदवाड़ा और बैतूल जिलों में हुए जानलेवा कफ सिरप कांड से बच पाए। इस त्रासदी में 26 बच्चों की मौत हो चुकी है। गंभीर हालत में मासूम को कई शहरों के अस्पतालों में चार महीने से अधिक समय तक इलाज कराना पड़ा। आखिरकार सोमवार रात उसे AIIMS नागपुर से डिस्चार्ज किया गया।

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भारी कीमत चुकाकर मिली जिंदगी
टिक्कू यादववंशी पहले एक निजी फाइनेंस कंपनी में काम करते थे। बेटे के इलाज के दौरान—

  • पिछले चार महीनों से सैलरी नहीं मिली
  • हाउसिंग लोन की EMI नहीं चुका पाए
  • इलाज के खर्च के लिए मवेशी बेचने पड़े
  • नागपुर में लंबे इलाज के दौरान पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े

वे बताते हैं, “इलाज के साथ-साथ रहने, खाने और बाकी जरूरतों का खर्च भी हमें ही उठाना पड़ा। सरकारें और अधिकारी आते-जाते रहेंगे, लेकिन हमने इन चार महीनों में जो झेला, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।”

छिंदवाड़ा से नागपुर तक इलाज की दर्दनाक यात्रा
पिता के मुताबिक, बच्चे की तबीयत 24 अगस्त को बिगड़नी शुरू हुई।

  • पहले उसे परासिया में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले जाया गया
  • दो दिन बाद हालत और खराब हुई
  • 1 सितंबर को तुरंत नागपुर ले जाकर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया
  • स्थिति गंभीर होने पर 11 सितंबर को उसे AIIMS नागपुर में शिफ्ट किया गया

यहीं बच्चे ने लंबे समय तक जिंदगी की जंग लड़ी।

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परिवार के सामने अब नई चुनौती
बेटा जिंदा है, लेकिन स्थायी विकलांगता के साथ। परिवार के सामने अब इलाज, पुनर्वास और रोजमर्रा की जिंदगी की नई चुनौतियां हैं। पिता की मांग है कि सरकार इस मामले में सिर्फ जांच तक सीमित न रहे, बल्कि पीड़ित परिवारों को आर्थिक और चिकित्सीय सहायता भी दे।

सवालों के घेरे में सिस्टम
छिंदवाड़ा टॉक्सिक कफ सिरप मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि दवा वितरण, निगरानी और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। 26 बच्चों की मौत और बचे हुए बच्चों की यह हालत बताती है कि लापरवाही की कीमत कितनी भयावह हो सकती है।

एक पिता का दर्द आज पूरे सिस्टम से सवाल पूछ रहा है—
अगर समय रहते जांच और नियंत्रण होता, तो क्या इतने मासूमों की जिंदगी तबाह होती?

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