
UP में कांशीराम जयंती पर सियासी घमासान, BSP-SP के बीच अब कांग्रेस भी मैदान में…
Kanshi Ram Jayanti: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच कांशी राम जयंती के आयोजन को लेकर चल रही राजनीतिक खींचतान के बीच अब कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर एंट्री कर दी है।
कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी कांशीराम जयंती से जुड़े कार्यक्रम में शामिल होने वाले हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी दलित स्कॉलर्स और सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी मुलाकात करेंगे और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम राज्य में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटबैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। कांग्रेस इस अवसर को “सामाजिक परिवर्तन दिवस” के रूप में मनाने की योजना बना रही है।
कांशीराम को बहुजन राजनीति का बड़ा चेहरा माना जाता है और उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव आज भी दिखाई देता है। ऐसे में उनकी जयंती को लेकर अलग-अलग दलों की सक्रियता को आगामी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
बसपा-सपा के बीच पहले से चल रही सियासी जंग
कांशीराम जयंती को लेकर सबसे पहले अखिलेश यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी ने बड़े आयोजन की तैयारी की घोषणा की थी। इसके बाद मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी।
बसपा का कहना था कि कांशीराम की विचारधारा और आंदोलन को आगे बढ़ाने का असली हक बसपा का है। पार्टी ने समाजवादी पार्टी पर राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था।
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कांग्रेस की रणनीति से बदला सियासी समीकरण
अब कांग्रेस की एंट्री से यह मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। पार्टी नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी की मौजूदगी से दलित और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर नई राजनीतिक बहस शुरू हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोटबैंक हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में कांशीराम जयंती के आयोजन को लेकर अलग-अलग दलों की सक्रियता को आने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
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चुनाव से पहले तेज होगी सियासी हलचल
आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति और गर्म होने की संभावना है। दलित और पिछड़े वर्गों के मुद्दों को लेकर राजनीतिक दल लगातार सक्रिय नजर आ रहे हैं।
ऐसे में कांशीराम जयंती के बहाने शुरू हुई यह सियासी जंग आगामी चुनावी रणनीतियों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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