11 साल पुराने लोन फ्रॉड केस में ईडी की कार्रवाई… बैंक को मिली ₹1.44 करोड़ की संपत्ति

ED Action: फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक कर्ज लेकर उसकी अदायगी न करने के एक पुराने मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शिमला जोनल यूनिट की कार्रवाई से बैंक ऑफ इंडिया को बड़ी राहत मिली है। करीब 11 साल पुराने इस मामले में ईडी की पहल पर 1.44 करोड़ रुपये मूल्य की अचल संपत्ति बैंक को वापस सौंपी गई है। यह संपत्ति मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए अर्जित धन का हिस्सा पाई गई थी, जिसे पहले कुर्क किया गया था।

2014 में दर्ज हुआ था मामला
यह मामला हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की अरविंद कास्टिंग प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी और उससे जुड़े अन्य आरोपियों पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2014 में बैंकों और वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेने के लिए जाली और कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। इस संबंध में 19 मई 2014 को ऊना जिले के हरोली थाना में एफआईआर दर्ज की गई थी।

एफआईआर के अनुसार, कंपनी ने गलत जानकारी देकर और फर्जी कागजातों के सहारे क्रेडिट सुविधाएं हासिल कीं, लेकिन न तो कर्ज की शर्तों का पालन किया गया और न ही समय पर भुगतान किया गया। इससे संबंधित बैंकों को भारी वित्तीय नुकसान हुआ।

जांच में सामने आई मनी लॉन्ड्रिंग
एफआईआर के आधार पर ईडी ने मामले में जांच शुरू की। जांच के दौरान सामने आया कि कर्ज की राशि का इस्तेमाल उस उद्देश्य के लिए नहीं किया गया, जिसके लिए उसे स्वीकृति दी गई थी। ईडी के मुताबिक, धन को अन्य संबंधित कंपनियों और संस्थाओं में स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग के स्पष्ट संकेत मिले।

इन तथ्यों के आधार पर ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत करीब 3.51 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया था। बाद में सक्षम न्यायिक प्राधिकरण ने इन कुर्की आदेशों की पुष्टि भी कर दी।

अदालत में अभियोजन और संज्ञान
ईडी ने 15 जून 2020 को धर्मशाला स्थित विशेष अदालत (पीएमएलए) में अभियोजन शिकायत दाखिल की। इस पर अदालत ने 1 मार्च 2021 को संज्ञान लिया। मामले की सुनवाई के दौरान ईडी ने पीड़ित बैंकों को राहत दिलाने की दिशा में पहल की।

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बैंक को संपत्ति सौंपने का आदेश
ईडी ने विशेष न्यायालय के समक्ष ‘आपत्ति न होने’ का आवेदन दायर किया, जिसमें बैंक ऑफ इंडिया के पक्ष में कुर्क की गई संपत्तियों का एक हिस्सा सौंपने का अनुरोध किया गया। ईडी ने अदालत को बताया कि यह संपत्ति अपराध से अर्जित धन का हिस्सा है और कानून की मंशा के अनुसार इसे वैध दावेदार यानी बैंक को लौटाया जाना चाहिए।

सभी पक्षों को सुनने के बाद धर्मशाला स्थित विशेष न्यायालय (पीएमएलए) ने ईडी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। अदालत के आदेश के तहत 1.44 करोड़ रुपये मूल्य की अचल संपत्ति बैंक ऑफ इंडिया को सौंप दी गई।

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बैंकों के लिए अहम संदेश
यह कार्रवाई न सिर्फ बैंक ऑफ इंडिया के लिए राहत लेकर आई है, बल्कि ऐसे मामलों में एक मजबूत संदेश भी देती है कि आर्थिक अपराधों और मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए अर्जित संपत्तियों को अंततः जब्त कर वैध दावेदारों को लौटाया जा सकता है। ईडी की इस कार्रवाई को बैंकिंग सेक्टर में धोखाधड़ी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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