Sambhal में ‘भालू’ बने किसान, बंदरों के आतंक से बचाने लगा देसी जुगाड़…

UP News: उत्तर प्रदेश के संभल जिला में किसानों की मजबूरी और जुगाड़ का एक ऐसा अनोखा उदाहरण सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। यहां किसान बंदरों के बढ़ते आतंक से परेशान होकर अब खुद “भालू” बनकर अपनी फसलों की रखवाली कर रहे हैं।

बंदरों का बढ़ता आतंक
संभल के फिरोजपुर गांव सहित आसपास के इलाकों में बंदरों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ये बंदर खेतों में घुसकर आलू, स्ट्रॉबेरी और अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों के अनुसार, एक साथ बड़ी संख्या में आने वाले बंदर कुछ ही समय में पूरी फसल चौपट कर देते हैं।

किसानों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है, बल्कि लंबे समय से बनी हुई है। कई बार पारंपरिक उपाय जैसे पटाखे, शोर या जाल भी बेअसर साबित हुए हैं।

‘भालू’ बनकर निकला समाधान
इसी समस्या से निपटने के लिए किसानों ने एक अनोखा तरीका अपनाया। गांव के कुछ किसानों ने भालू की वेशभूषा खरीदकर उसे पहनना शुरू किया और पूरे दिन खेतों में घूमकर बंदरों को डराने लगे।

वे सिर्फ कपड़े ही नहीं पहनते, बल्कि भालू जैसी हरकतें—उछलना, दौड़ना और आवाजें निकालना—भी करते हैं, ताकि बंदरों को असली खतरे का अहसास हो।

असरदार साबित हो रहा जुगाड़
इस देसी तकनीक का असर भी साफ नजर आ रहा है। किसान बताते हैं कि जैसे ही बंदर “भालू” को देखते हैं, वे तुरंत डरकर भाग जाते हैं। इससे फसलों को होने वाला नुकसान काफी हद तक कम हो गया है।

गांव के कुछ किसानों ने तो मिलकर ऐसी कई वेशभूषाएं भी खरीद ली हैं, ताकि बारी-बारी से खेतों की निगरानी की जा सके।

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वन विभाग की प्रतिक्रिया
इस मामले पर वन विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि यह तरीका अस्थायी रूप से तो कारगर हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं है। उनका मानना है कि बंदरों को एक जगह से भगाने पर वे दूसरी जगह चले जाते हैं, इसलिए उन्हें पकड़कर सुरक्षित जंगल में छोड़ना ही बेहतर उपाय है।

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किसानों की मजबूरी और जुगाड़ की मिसाल
यह घटना सिर्फ एक अनोखी खबर नहीं, बल्कि किसानों की मजबूरी और उनकी रचनात्मक सोच का उदाहरण भी है। सीमित संसाधनों और लगातार नुकसान के बीच, उन्होंने अपने स्तर पर ऐसा समाधान खोजा, जो फिलहाल असरदार साबित हो रहा है।

संभल के किसानों का यह “भालू वाला जुगाड़” देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। यह दिखाता है कि जब समस्या बड़ी हो और समाधान न मिले, तो जमीनी स्तर पर लोग किस तरह नए-नए तरीके अपनाते हैं।

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