
भारत-रूस आर्थिक साझेदारी को नई गति, पुतिन की यात्रा के बाद बड़ा रोडमैप जारी
Vladimir Putin India Visit: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों ने 70 बिंदुओं वाला विस्तृत संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें आर्थिक, सामरिक और ऊर्जा सहयोग को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प व्यक्त किया गया है।
बयान में कहा गया है कि भारत और रूस आगामी वर्षों में व्यापार, निवेश, परमाणु ऊर्जा, ईंधन, खनिज, मुक्त व्यापार समझौते (एफ़टीए) और कुशल कामगारों की आवाजाही जैसे क्षेत्रों में बड़े कदम उठाएँगे।
आर्थिक सहयोग पर सबसे ज़्यादा ज़ोर
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि इस यात्रा का मुख्य फोकस आर्थिक साझेदारी था।
उन्होंने कहा, “इस समय वैश्विक सप्लाई चेन और निवेश माहौल दबाव में है। ऐसे दौर में भारत और रूस का आर्थिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित करना अपने आप में एक संदेश है।”
दोनों देशों ने उन समझौतों की सराहना की जो कुशल कामगारों की आवाजाही को आसान बनाएँगे। भारत ने ‘रूस-रेडी वर्कफ़ोर्स’ तैयार करने की योजना भी साझा की।
व्यापार लक्ष्य: 2030 तक 100 अरब डॉलर
पिछले वर्ष दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य तय किया था।
2024–25 में यह व्यापार 68.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि संभावनाओं को देखते हुए यह लक्ष्य शायद 2030 से पहले ही हासिल हो जाए।
सबसे बड़ी चुनौती: तेल व्यापार और अमेरिकी प्रतिबंध
विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार वृद्धि का सबसे बड़ा आधार तेल है।
2024 में भारत ने रूस से 52.7 अरब डॉलर का तेल आयात किया था।
जेएनयू के डॉ. अमिताभ सिंह ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण बैंक और निजी कंपनियाँ रूस से तेल लेने में हिचकिचा रही हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि “जब तक प्रतिबंधों का समाधान नहीं निकलता, तेल व्यापार और कुल व्यापार वृद्धि दोनों प्रभावित होंगी।”
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FTA से व्यापार में विविधता लाने की कोशिश
भारत और रूस यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU) के साथ मिलकर एक मुक्त व्यापार समझौते पर काम कर रहे हैं। इस समझौते से दोनों देशों के बीच गैर-तेल व्यापार–जैसे फार्मा, कृषि, मशीनरी और खनिज–को बढ़ावा मिलेगा।
दोनों देशों ने राष्ट्रीय मुद्राओं—रूपया और रूबल—में व्यापार बढ़ाने, शुल्क कम करने और लॉजिस्टिक बाधाएँ दूर करने पर भी सहमति जताई।
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अमेरिका और पश्चिम की कड़ी नज़र
पुतिन की यात्रा को पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका, ने करीब से देखा है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियों पर पश्चिमी जगत पहले ही संवेदनशील है। हालाँकि भारत ने फिर दोहराया कि उसकी विदेश नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है और रूस उसका विश्वसनीय ऊर्जा और रक्षा साझेदार है।
भारत और रूस दोनों इस बात पर सहमत हैं कि मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में दीर्घकालीन साझेदारी मजबूत करना जरूरी है।
हालाँकि—तेल व्यापार, अमेरिकी प्रतिबंध, बैंकिंग प्रतिबंध, एफटीए की जटिलताएँ और लॉजिस्टिक चुनौतियाँ—इन सभी बड़े अवरोधों का समाधान ढूँढना द्विपक्षीय संबंधों की वास्तविक परीक्षा होगी।
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