
फ्रांस में राजनीतिक संकट… नए पीएम लेकोर्नू का इस्तीफा, मैक्रों की बढ़ीं मुश्किलें
France new PM Resigns: फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की राजनीतिक परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। सोमवार, 6 अक्टूबर को राष्ट्रपति ने प्रधान मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। यह इस्तीफा नई कैबिनेट के ऐलान के कुछ घंटे के भीतर सामने आया, जिससे फ्रांस में राजनीतिक गतिरोध और बढ़ गया।
पूरा मामला
राष्ट्रपति मैक्रों ने पिछले महीने ही सेबेस्टियन लेकोर्नू को प्रधान मंत्री के पद के लिए नामित किया था। इसके बाद रविवार की देर रात नई कैबिनेट का ऐलान किया गया। इस कैबिनेट में लेकोर्नू ने अधिकांश परिचित चेहरों को शामिल किया था।
लेकिन ऐलान के कुछ ही घंटे बाद प्रधान मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे ने देश में राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ा दिया है।
राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि
फ्रांस की वर्तमान स्थिति न सिर्फ राजनीतिक बल्कि आर्थिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण है। न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार:
- फ्रांस का सार्वजनिक ऋण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।
- देश का कर्ज और GDP अनुपात यूरोपीय संघ में ग्रीस और इटली के बाद तीसरा सबसे बड़ा है।
- यूरोपीय संघ के नियमों के अनुसार अनुमति प्राप्त सीमा (60%) से यह लगभग दोगुना है।
पिछली सरकारों ने पिछले तीन वार्षिक बजट बिना संसद वोट के पेश किए थे। संविधान के अनुसार यह वैध है, लेकिन विपक्ष ने इसकी आलोचना की। लेकोर्नू ने पिछले सप्ताह यह सुनिश्चित करने का वादा किया था कि आगामी विधेयक पर सांसद मतदान कर सकेंगे।
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मैक्रों की राजनीतिक चुनौती
राष्ट्रपति मैक्रों ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए पिछले साल आकस्मिक संसदीय चुनाव कराया था। इसके बावजूद विधानसभा में उनका गुट अल्पमत में रह गया। इस कदम का उल्टा असर हुआ और राजनीतिक गतिरोध और गहरा गया।
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इस्तीफे के प्रभाव
- नए कैबिनेट का ऐलान और प्रधानमंत्री का इस्तीफा घंटों के भीतर सामने आने से सरकार की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
- फ्रांस की राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, जिससे मैक्रों के प्रशासन पर दबाव और बढ़ गया।
- देश की बढ़ती कर्ज समस्या और संसद में अल्पमत की स्थिति प्रशासन के लिए अतिरिक्त चुनौती बने हुए हैं।
फ्रांस में सेबेस्टियन लेकोर्नू का अचानक इस्तीफा देश में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा रहा है। राष्ट्रपति मैक्रों के लिए यह संकट गंभीर साबित हो रहा है, जबकि आर्थिक स्थिति और संसद में अल्पमत उनकी चुनौतियों को और बढ़ा रही है।
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