भिवंडी में सियासी ड्रामा… सेक्युलर फ्रंट ने छीनी भाजपा की कुर्सी

Bhiwandi Mayor Election: महाराष्ट्र के भिवंडी में मेयर चुनाव के नतीजों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा, जबकि पार्टी से बगावत कर अलग मोर्चा बनाने वाले नारायण चौधरी महापौर चुन लिए गए।

48 वोट लेकर जीते नारायण चौधरी
मेयर चुनाव में नारायण चौधरी को कुल 48 वोट मिले। यह जीत इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने भाजपा से अलग होकर ‘भिवंडी सेक्युलर फ्रंट’ बनाया था। इस फ्रंट को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समेत कुछ अन्य दलों का समर्थन मिला।

बीजेपी में अंदरूनी असंतोष बना वजह
बताया जा रहा है कि नगर निगम की राजनीति में टिकट वितरण, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दों को लेकर भाजपा के भीतर लंबे समय से असंतोष था। नारायण चौधरी के नेतृत्व में नौ पार्षदों ने पार्टी से दूरी बना ली। इन पार्षदों के अलग होने से भाजपा का गणित बिगड़ गया और मेयर चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ा।

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कांग्रेस समर्थित फ्रंट से बदला समीकरण
बागी पार्षद कांग्रेस समर्थित सेक्युलर फ्रंट के करीब आ गए। इस गठजोड़ ने चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ स्थानीय स्तर पर रणनीतिक कदम था।

2017 जैसा दोहराया गया सियासी समीकरण
भिवंडी की सियासत में यह घटनाक्रम नया नहीं है। इससे पहले 2017 के मेयर चुनाव में भी पार्षदों के पाला बदलने से सत्ता का समीकरण बदल गया था। इस बार भी वैसी ही स्थिति बनी और भाजपा का मजबूत दावा कमजोर पड़ गया।

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भाजपा समर्थकों ने बताया ‘स्ट्रेटेजिक पैंतरा’
भाजपा से जुड़े कुछ नेताओं ने इस घटनाक्रम को ‘स्ट्रेटेजिक पैंतरा’ बताते हुए कहा कि स्थानीय राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं और आगे पार्टी मजबूती से वापसी करेगी।

अब देखना होगा कि महापौर बनने के बाद नारायण चौधरी नगर निगम में किस तरह का राजनीतिक और विकासात्मक एजेंडा आगे बढ़ाते हैं। अगर आप चाहें तो मैं भिवंडी की नगर राजनीति, पार्षदों की संख्या और आगे की संभावित सियासी रणनीति पर भी विस्तार से बता सकता हूँ।

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