‘सर तन से जुदा’ नारा भारत की संप्रभुता के लिए खतरा, बरेली हिंसा केस में हाई कोर्ट सख्त

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2005 के बरेली हिंसा मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि हिंसा को उकसाने वाले और राज्य की वैध सत्ता को चुनौती देने वाले नारे किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हैं। अदालत ने कहा कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा” जैसा नारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता पर सीधा प्रहार है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह के नारे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के दायरे में आते हैं, क्योंकि वे हिंसा, सशस्त्र विद्रोह और कानून व्यवस्था को कमजोर करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी धार्मिक आस्था के नाम पर भारतीय कानून से अलग सजा तय करना संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देना है।

धर्म और संविधान पर संतुलित रुख
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धार्मिक नारों का उद्देश्य श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करना होता है, न कि डर या धमकी पैदा करना। जब नारे जानबूझकर किसी समुदाय को भयभीत करने या हिंसा के लिए उकसाने के मकसद से लगाए जाते हैं, तभी वे अपराध की श्रेणी में आते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि विवादित नारे का कुरान या इस्लामी शिक्षाओं में कोई आधार नहीं है और पैगंबर मोहम्मद के जीवन से करुणा और क्षमा के उदाहरण मिलते हैं, न कि हिंसा के।

ऐतिहासिक संदर्भ और नारे की उत्पत्ति
कोर्ट ने ऐतिहासिक घटनाओं का हवाला देते हुए बताया कि ईशनिंदा कानूनों के संदर्भ में यह नारा पाकिस्तान में उभरा और बाद में कुछ जगहों पर इसका दुरुपयोग राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए किया गया। अदालत ने चेताया कि ऐसे नारों का प्रसार सामाजिक सौहार्द और सार्वजनिक शांति के लिए गंभीर खतरा है।

यह भी पढ़ें…

CM Yogi करेंगे गोरखनाथ ओवरब्रिज का लोकार्पण… शहरवासियों को मिलेगी राहत

क्या है मामला?
सितंबर 2005 में बरेली में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे, जिसके बाद भीड़ और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इसमें पुलिसकर्मियों के घायल होने और सार्वजनिक-निजी संपत्ति को नुकसान की बात सामने आई। आरोपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए जमानत मांगी थी।

यह भी पढ़ें…

Codine Syrup पर गरमाई यूपी की सियासत… CM Yogi पर अखिलेश का पलटवार

जमानत पर फैसला
हाई कोर्ट ने केस डायरी में मौजूद तथ्यों के आधार पर माना कि आरोपी गैरकानूनी सभा का हिस्सा था और हिंसा में संलिप्तता के प्रथम दृष्टया संकेत हैं। इसी कारण जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि संविधान, कानून और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ किसी भी तरह के उकसावे को न्यायपालिका सख्ती से देखेगी।

यह भी पढ़ें…

साइकिल से लैंबार्गिनी तक का सफर… क्रूज पर शादी से ED रेड तक, कौन है यूट्यूबर अनुराग द्विवेदी?

Back to top button