
बंगाल वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त… न्यायिक निगरानी में होगा SIR
West Bengal SIR Voter List Case: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच जारी विवाद पर Supreme Court of India ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि दोनों संस्थाओं के बीच विश्वास की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट को इस प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों की तैनाती करने का निर्देश दिया है, ताकि दावे और आपत्तियों के निपटारे में पारदर्शिता बनी रहे।
कोर्ट ने क्यों दिया यह आदेश?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ—मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली—ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन को लेकर पैदा हुए विवाद को देखते हुए न्यायिक निगरानी आवश्यक हो गई है।
कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच समन्वय की कमी के कारण मतदाता सूची में शामिल नामों पर उठे विवादों का समाधान निष्पक्ष ढंग से होना चाहिए। इसी उद्देश्य से हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया गया कि वे इस प्रक्रिया में सहयोग के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करें।
न्यायिक अधिकारियों को दिए गए विशेष अधिकार
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR प्रक्रिया की निगरानी के लिए तैनात किया जाएगा।
- जरूरत पड़ने पर पूर्व न्यायाधीशों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।
- इन अधिकारियों के आदेश को अदालत का आदेश माना जाएगा।
- जिला प्रशासन, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक इन आदेशों का पालन सुनिश्चित करेंगे।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पूरी प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव या पक्षपात के आरोप कम हो सकते हैं।
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28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची
सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India को 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दे दी है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि बाद में कोई त्रुटि सामने आती है या नए दावे स्वीकार होते हैं, तो आयोग सप्लीमेंट्री सूची जारी कर सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ गया था। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल ने आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया।
राज्य सरकार और आयोग के बीच टकराव इतना बढ़ गया कि कई मामलों में प्रशासनिक सहयोग पर भी सवाल उठे। यही कारण रहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
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चुनावी पारदर्शिता पर जोर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक निगरानी से मतदाता सूची में गड़बड़ी की आशंकाएं कम होंगी और चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बढ़ेगा।
अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायिक अधिकारियों की तैनाती के बाद SIR प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विवादमुक्त हो पाती है। साथ ही 28 फरवरी को जारी होने वाली अंतिम मतदाता सूची पर भी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।
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