Passport से गायब हुआ ‘थर्ड जेंडर’! ट्रंप प्रशासन को ‘जैविक लिंग’ अनिवार्य करने की मंजूरी

US News: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम आदेश जारी करते हुए ट्रंप प्रशासन को यह अनुमति दे दी कि अमेरिकी पासपोर्ट पर लिंग विवरण यात्री के जैविक लिंग — पुरुष या महिला — के अनुरूप ही दर्ज किया जाए।

यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए अदालत के आपातकालीन एजेंडा में एक और जीत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि एलजीबीटीक्यू अधिकारों के लिए यह एक और झटका है — खासतौर पर उस समय, जब सुप्रीम कोर्ट ट्रांसजेंडर अमेरिकियों से संबंधित कई राज्य कानूनों पर भी विचार कर रहा है।

न्यायमूर्ति जैक्सन की असहमति
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा नियुक्त न्यायमूर्ति केतनजी ब्राउन जैक्सन ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। अपनी असहमति (dissent) में उन्होंने लिखा,

“स्पष्ट न्यायसंगत परिणाम को इस तरह बेतुके ढंग से नजरअंदाज करना अब एक दुर्भाग्यपूर्ण चलन बन गया है। जब बुनियादी सिद्धांतों को चुनिंदा ढंग से दरकिनार किया जाता है, तो मैं भी नजरअंदाज कर देती हूँ।”

उनके साथ दो अन्य उदारवादी न्यायाधीश भी असहमत पक्ष में शामिल हुए। जैक्सन ने कहा कि अदालत ने “बिना किसी पर्याप्त औचित्य के तुरंत नुकसान पहुंचाने का रास्ता साफ कर दिया है।”

एसीएलयू और अधिकार समूहों की तीखी प्रतिक्रिया
अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन (ACLU), जिसने इस नीति को अदालत में चुनौती दी थी, ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “सभी लोगों की स्वतंत्रता के लिए एक हृदयविदारक झटका” बताया।

एसीएलयू के एलजीबीटीक्यू और एचआईवी प्रोजेक्ट के वरिष्ठ वकील जॉन डेविडसन ने कहा कि ट्रांसजेंडर लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध पासपोर्ट रखने के लिए मजबूर करने से उनके उत्पीड़न और हिंसा का जोखिम बढ़ता है। यह पहले से ही उनकी स्वतंत्रता, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति के संघर्ष को और कठिन बना देता है।

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ट्रंप प्रशासन की नीति और उसका प्रभाव
यह नीति जनवरी 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जारी एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) के तहत लागू की गई थी।
इसमें कहा गया था कि संघीय दस्तावेज़ों — जैसे पासपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र — में केवल दो ही लिंग श्रेणियाँ होंगी: पुरुष (Male) और महिला (Female), जो व्यक्ति के जैविक वर्गीकरण (Biological Sex) पर आधारित होंगी।

यह आदेश बाइडेन प्रशासन (2021) की उस नीति को अस्थायी रूप से रद्द कर देता है, जिसमें अमेरिकियों को मेडिकल प्रमाणपत्र दिए बिना अपने लिंग का चयन करने की स्वतंत्रता दी गई थी — जिसमें “X” (नॉन-बाइनरी) विकल्प भी शामिल था।

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह निर्णय अमेरिका में ट्रांस और नॉन-बाइनरी समुदाय की सुरक्षा, यात्रा की स्वतंत्रता और आत्मपहचान के अधिकार को सीमित कर सकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर अमेरिकी कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय यात्रा दस्तावेज़ मानकों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि कई देशों में अब तीसरे लिंग या “X” विकल्प को आधिकारिक रूप से मान्यता दी जा चुकी है।

यह फैसला आने वाले महीनों में एलजीबीटीक्यू अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अमेरिका के भीतर चल रही वैचारिक बहस को और तेज कर सकता है। जहां ट्रंप प्रशासन इसे “जैविक सटीकता और दस्तावेज़ीय सत्यता” का मामला बता रहा है, वहीं अधिकार समूह इसे “मानव गरिमा और आत्मपहचान के दमन” के रूप में देख रहे हैं।

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