तीन दिन… 300 मौतें, तेलंगाना में आवारा कुत्तों का कत्लेआम

Dogs Killing in Telangana: तेलंगाना के कामरेड्डी जिला में सामने आई सामूहिक पशु-हत्या की घटना ने न केवल राज्य प्रशासन बल्कि पूरे देश में पशु अधिकारों और स्थानीय शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में महज़ तीन दिनों के भीतर लगभग 300 आवारा कुत्तों की सुनियोजित तरीके से हत्या किए जाने के आरोप लगे हैं। इस मामले में गांवों के सरपंच, पंचायत सचिव और कुछ स्थानीय लोगों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है।

तीन दिन… सैकड़ों मौतें
स्थानीय सूत्रों और पशु कल्याण संगठनों के अनुसार 6, 7 और 8 जनवरी को अलग-अलग गांवों में आवारा कुत्तों को जहरीले इंजेक्शन, ज़हर मिले भोजन और दवाइयों के ज़रिये मारा गया। कई जगहों पर कुत्तों के शव खेतों, नालों और खुले इलाकों में मिले, जिससे गांवों में दहशत और गुस्से का माहौल बन गया।

ग्रामीणों का कहना है कि यह कार्रवाई अचानक नहीं थी, बल्कि पहले से तय योजना के तहत की गई। कुछ गांवों में कथित तौर पर बाहरी लोगों को बुलाकर कुत्तों को मारने का काम सौंपा गया।

पंचायत स्तर पर ‘समस्या समाधान’ का गलत तरीका
ग्रामीण इलाकों में आवारा कुत्तों को लेकर लंबे समय से शिकायतें रही हैं—काटने की घटनाएं, बच्चों में डर और मवेशियों पर हमले। आरोप है कि पंचायत प्रतिनिधियों ने इसी असंतोष को आधार बनाकर “त्वरित समाधान” चुना, जो पूरी तरह गैरकानूनी और अमानवीय था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना पंचायत स्तर पर कानूनी जानकारी की कमी और प्रशासनिक निगरानी के अभाव का नतीजा है। कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि आवारा कुत्तों को मारना अपराध है, इसके बावजूद खुलेआम यह कृत्य किया गया।

शिकायत, FIR और जांच
घटना की जानकारी मिलने पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने तत्काल पुलिस से संपर्क किया। शायंपेटा पुलिस स्टेशन में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके बाद FIR दर्ज हुई।
पुलिस ने बताया कि:

  • मृत कुत्तों के पोस्टमॉर्टम कराए जा रहे हैं
  • विसरा नमूने फोरेंसिक जांच के लिए भेजे गए हैं
  • पंचायत रिकॉर्ड, भुगतान विवरण और कॉल रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं

एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “अगर यह साबित होता है कि जनप्रतिनिधियों ने आदेश देकर यह काम कराया, तो उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।”

प्रशासनिक निष्क्रियता भी कटघरे में
इस मामले ने केवल आरोपियों को ही नहीं, बल्कि स्थानीय निकायों और राज्य प्रशासन को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि:

  • एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) कार्यक्रम क्यों लागू नहीं किया गया?
  • एंटी-रेबीज़ टीकाकरण अभियान क्यों अधूरा रहा?
  • पंचायतों को वैध समाधान के लिए मार्गदर्शन क्यों नहीं मिला?

पशु विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम चलाए जाते, तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती।

कानून क्या कहता है?
भारत में आवारा कुत्तों को मारना:

  • पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का उल्लंघन है
  • एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम, 2023 के खिलाफ है
  • दोषी पाए जाने पर जुर्माना, जेल या दोनों की सजा हो सकती है

कानून स्पष्ट है कि कुत्तों की आबादी नियंत्रण का एकमात्र वैध तरीका नसबंदी और टीकाकरण है, न कि हत्या। फिलहाल पुलिस जांच जारी है और फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा है। इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत स्तर पर कानूनी प्रशिक्षण ज़रूरी है।

 

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