लखनऊ में सहभोज के बहाने जुटे BJP के ब्राह्मण विधायक, बढ़ गया UP का सियासी तापमान

UP Politics: राजधानी लखनऊ में मंगलवार शाम को सहभोज के बहाने बीजेपी के करीब 40 ब्राह्मण विधायक एकत्रित हुए, जिसके बाद प्रदेश में सियासी हलचल तेज हो गई है।

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जातीय गोलबंदी का नया अध्याय शुरू हो गया है। विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के बीच 23 दिसंबर 2025 की शाम को कुशीनगर से भाजपा विधायक पी.एन. पाठक (पंचानंद पाठक) के लखनऊ स्थित सरकारी आवास पर एक अहम बैठक हुई। बाहर से इसे ‘सहभोज’ का नाम दिया गया, जहां विधायकों को लिट्टी-चोखा और फलाहार परोसा गया, लेकिन अंदर की चर्चा ब्राह्मण समाज की राजनीतिक उपेक्षा, सामाजिक न्याय और आगे की रणनीति पर केंद्रित रही।

ब्राह्मण विधायकों के एकजुट होने पर सियासत तेज

बीजेपी विधायकों के साथ ही इस आयोजन में अन्य दलों के विधायक भी पहुंचे। ब्राह्मण विधायकों और एमएलसी का जुटान कुशीनगर के विधायक पीएन पाठक के आवास पर हुआ। जिसमें खासतौर पर पूर्वांचल और बुंदेलखंड के विधायक पहुंचे थे। विधायकों का कहना है कि यह सहभोज था, कोई बैठक नहीं थी। इसे लेकर मिर्जापुर नगर विधानसभा सीट से विधायक रत्नाकर मिश्रा ने कहा है कि कुशीनगर के विधायक पंचानंद पाठक ने यह आयोजन किया था। इसमें लगभग चार दर्जन ब्राह्मण विधायक शामिल थे। उन्होंने दावा किया कि इस दौरान कोई राजनीतिक चर्चा नहीं हुई थी।

सहभोज कार्यक्रम में शामिल हुए ये विधायक

जानकारी के मुताबिक विधायक पीएन पाठक के आवास पर हुए सहभोज कार्यक्रम में बीजेपी विधायक रत्नाकर मिश्र, उमेश द्विवेदी (MLC), प्रकाश द्विवेदी, रमेश मिश्र, शलभमणि त्रिपाठी, विपुल दूबे, राकेश गोस्वामी, रवि शर्मा, विनोद चतुर्वेदी, संजय शर्मा, विवेकानंद पाण्डेय पहुंचे।

इनके अलावा बीजेपी विधायक अनिल त्रिपाठी, अंकुर राज तिवारी, साकेत मिश्र, बाबूलाल तिवारी MLC, विनय द्विवेदी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पाराशर, कैलाशनाथ शुक्ला, प्रेमनारायण पाण्डेय, ज्ञान तिवारी, सुनील दत्त द्विवेदी, धर्मेंद्र सिंह भूमिहार MLC और अन्य विधायक भी मौजूद थे।

आखिर क्या है मकसद?

ब्राह्मण वोट बैंक यूपी की सियासत में हमेशा निर्णायक रहा है तो मकसद साफ है, समाज को संगठित कर राजनीतिक दबाव बनाना।  12 -14 प्रतिशत आबादी वाले इस समुदाय का प्रभाव शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में है। भाजपा ने 2017 और 2022 में ब्राह्मणों के बड़े समर्थन से जीत हासिल की, लेकिन अब उपेक्षा की शिकायतें सामने आ रही हैं।

खासकर समाजवादी पार्टी इसे भुनाने की कोशिश कर रही है। यह हलचल आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति को नया रंग दे सकती है। 2027 के विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं और जातीय समीकरण एक बार फिर खेल बदलने वाले साबित हो सकते हैं। देखना यह होगा कि भाजपा इसे कैसे हैंडल करती है और विपक्ष कितना फायदा उठा पाता है।

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