“कश्मीर बागवानी की नई चुनौती…अमेरिका डील से घाटी के किसानों पर खतरा या मौका?”

Jammu and Kashmir: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर जम्मू-कश्मीर के हॉटिकल्चर (बागवानी) सेक्टर में तीखी बहस छिड़ गई है।

घाटी की अर्थव्यवस्था का अहम आधार माने जाने वाले सेब, अखरोट और अन्य ड्राई फ्रूट कारोबार पर इस समझौते के संभावित असर को लेकर बागवानों और व्यापारियों की राय बंटी हुई है।

जहां एक वर्ग को डर है कि अगर अमेरिकी कृषि उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती होती है तो स्थानीय बाजार सस्ते विदेशी माल से भर जाएगा, वहीं कुछ कारोबारी इसे प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता सुधार का अवसर मान रहे हैं।

घाटी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है बागवानी
जम्मू-कश्मीर में लाखों परिवार सीधे या परोक्ष रूप से बागवानी से जुड़े हैं। सेब उत्पादन में कश्मीर देश का अग्रणी क्षेत्र है, जबकि अखरोट और बादाम जैसे ड्राई फ्रूट अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी पहचान रखते हैं। ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते का सीधा असर स्थानीय किसानों की आय पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिकी सेब और ड्राई फ्रूट कम शुल्क पर भारतीय बाजार में आते हैं तो कीमतों में गिरावट संभव है, जिससे घाटी के उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

किसानों की चिंता: सस्ता आयात बिगाड़ सकता है बाजार
शोपियां, बारामूला और पुलवामा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक जिलों के कई बागवानों का कहना है कि पहले से ही बढ़ती लागत—खाद, कीटनाशक, पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट—ने उनकी कमर तोड़ रखी है। ऐसे में विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं होगा।

एक सेब उत्पादक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“अगर अमेरिकी सेब कम कीमत पर बाजार में आते हैं तो हमारे उत्पाद की मांग और दाम दोनों प्रभावित होंगे। सरकार को स्थानीय किसानों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान करने चाहिए।”

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कुछ कारोबारियों की अलग राय: प्रतिस्पर्धा से बढ़ेगी गुणवत्ता
हालांकि सभी की सोच एक जैसी नहीं है। शोपियां के अखरोट उत्पादक और डीलर जावेद अहमद लोन का मानना है कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

उन्होंने कहा,
“इंपोर्टेड सामान के संपर्क में आने से लोकल किसान अपना स्टॉक अपग्रेड करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। अगर हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिकना है तो पैकेजिंग, ग्रेडिंग और क्वालिटी पर ध्यान देना ही होगा।”

कुछ व्यापारियों का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से कीमतों में स्थिरता आ सकती है और उपभोक्ताओं को बेहतर विकल्प मिलेंगे। इससे लंबी अवधि में बाजार अधिक संगठित और पारदर्शी हो सकता है।

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सरकार की भूमिका पर नजर
स्थानीय व्यापार संगठनों का कहना है कि किसी भी ट्रेड डील को अंतिम रूप देने से पहले केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर के हॉटिकल्चर सेक्टर के हितों का ध्यान रखना चाहिए। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि यदि आयात शुल्क में कटौती होती है तो साथ ही स्थानीय किसानों के लिए सब्सिडी, कोल्ड स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर, एक्सपोर्ट प्रमोशन और ब्रांडिंग समर्थन जैसे कदम भी उठाए जाने चाहिए, ताकि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें।

फिलहाल प्रस्तावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत जारी है और अंतिम शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं। लेकिन घाटी के बागवानी सेक्टर में चर्चा तेज हो चुकी है। एक ओर जहां अनिश्चितता और आशंका का माहौल है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे सुधार और आधुनिकरण का अवसर मान रहे हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह संभावित समझौता कश्मीर की बागवानी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती साबित होगा या नया अवसर।

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