
‘भूखा और थक चुका हूं’… एक दिन में 235 मामलों की सुनवाई, हाईकोर्ट में जज का छलका दर्द
UP News: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने एक दिन में 235 मामलों की सुनवाई के दौरान अत्यधिक थकान और भूख के कारण निर्णय सुरक्षित रखा।
UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में सूचीबद्ध मामलों की भारी संख्या के कारण एक न्यायाधीश ने खुले न्यायालय में ही निर्णय लिखाने में असमर्थता जताई। उन्होंने कहा कि वे भूखे, थके और शारीरिक रूप से निर्णय लिखाने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए आदेश सुरक्षित रखा जाता है। यह वाकया बीते मंगलवार का है। यह मामला न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ के समक्ष था। पीठ चंद्रलेखा सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
एक दिन में 235 मामलों की सुनवाई
इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां 25 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश यह कहते हुए रद कर दिया कि संबंधित पक्षकार को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वह याचिका का शीघ्र निस्तारण करे और संभव हो तो छह माह के भीतर निर्णय दे।
यह समयसीमा 24 फरवरी 2026 तक की थी। मंगलवार को न्यायमूर्ति विद्यार्थी के समक्ष कुल 235 मामले सूचीबद्ध थे, जिनमें 92 नए मामले, 101 नियमित मामले, 39 ताजा विविध आवेदन तथा अतिरिक्त सूची में तीन मामले शामिल थे। अपराह्न सवा चार बजे तक वह केवल 29 ताजा मामलों की ही सुनवाई कर सके थे।
जज ने खुली अदालत में जताई असमर्थता
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट से वापस आए वर्तमान मामले की जानकारी दी गई, जिसके बाद न्यायालय ने तुरंत इसकी सुनवाई शुरू की। इस मामले में याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अनुज कुदेसिया, विपक्षियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप कुमार तथा केनरा बैंक की ओर से अधिवक्ता पीके श्रीवास्तव ने विस्तृत बहस की।
सुनवाई अपराह्न सवा चार बजे शुरू होकर शाम सात बजकर 10 मिनट तक चली। लंबी बहस और पूरे दिन की कार्यवाही के बाद न्यायाधीश ने स्वयं को अत्यधिक थका हुआ बताते हुए कहा कि वह तत्काल निर्णय लिखाने की स्थिति में नहीं हैं। निर्णय सुरक्षित रखते हुए न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि भारी सूची के कारण सीमित मामलों की ही सुनवाई संभव हो सकी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को ध्यान में रखते हुए इस विशेष मामले की सुनवाई प्राथमिकता पर की गई। अंततः न्यायाधीश ने कहा कि वह स्वयं को भूखा, थका और शारीरिक रूप से निर्णय लिखाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं, इसलिए आदेश सुरक्षित रखा जाता है।





