
सुप्रीम कोर्ट में स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा शामिल करने की मांग, केंद्र और राज्यों को नोटिस
Supreme Court News: देशभर के स्कूली पाठ्यक्रम में ट्रांसजेंडर-समावेशी व्यापक यौन शिक्षा (Comprehensive Sexuality Education) को अनिवार्य रूप से शामिल करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। यह याचिका एक 12वीं कक्षा के छात्र ने दायर की है।
सोमवार को इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया और चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा। कोर्ट के इस कदम से इस मुद्दे पर देशभर में व्यापक चर्चा शुरू होने की उम्मीद है।
याचिका में क्या कहा गया
याचिकाकर्ता छात्र ने दलील दी है कि भारत के स्कूलों में अभी भी वैज्ञानिक और समावेशी यौन शिक्षा का अभाव है, जिसके कारण किशोरों में जागरूकता की कमी है। इसका असर सीधे तौर पर उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और लैंगिक समानता पर पड़ता है। याचिका में विशेष रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और उनकी स्वीकृति को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की मांग की गई है।
छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का भी हवाला दिया, जिसमें जेंडर इक्विटी फंड (GIF) के तहत शिक्षा प्रणाली में लैंगिक समानता और समावेशिता को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या स्कूलों में यौन शिक्षा और नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए अब तक कोई ठोस कदम उठाए गए हैं। चीफ जस्टिस गवई पहले भी इस बात पर जोर दे चुके हैं कि नैतिक शिक्षा और लैंगिक समानता को उसी तरह अनिवार्य बनाया जाए, जैसे पर्यावरण विज्ञान को किया गया है।
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आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र और राज्यों से स्पष्ट जवाब मांगा है। अब सभी की नजरें इस पर टिकी हैं कि आने वाले हफ्तों में सरकारें इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर क्या रुख अपनाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोर्ट इस पर सख्त दिशा-निर्देश जारी करता है तो यह देश की शिक्षा प्रणाली में ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकता है।
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