‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद… दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका, गिरफ्तारी और FIR पर सवाल

I Love Mohammed: उत्तर प्रदेश में ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर को लेकर उठे विवाद ने कई राज्यों में तूल पकड़ लिया है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तेलंगाना, गुजरात और महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पोस्टर के समर्थन में सड़क पर प्रदर्शन किया। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार भी किया गया। इसी बीच इस मामले में दर्ज एफआईआर और गिरफ्तारी का मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया।

हाईकोर्ट में याचिका
भारतीय मुस्लिम छात्र संगठन और रजा अकादमी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम समुदाय के लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपने त्योहार मना रहे थे, लेकिन उन्हें उनके धार्मिक अधिकारों को चुनौती देने वाले झूठे आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि उनकी आस्था की अभिव्यक्ति को सांप्रदायिक और दंगा-प्रवण बताकर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।


याचिकाकर्ताओं की दलीलें

  • याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि जिन लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए हैं, उन्हें वापस लिया जाए और गिरफ्तार लोगों को तत्काल रिहा किया जाए।
  • मामले में आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के लोग सिर्फ पोस्टर, बैनर और शांतिपूर्ण सभाओं के माध्यम से त्योहार मना रहे थे। इसके बावजूद उन्हें अपराधियों की तरह निशाना बनाया गया।
  • एफआईआर काइसरगंज, बहराइच में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 187, 351, 187(2)/188 और 356 के तहत दर्ज की गई।

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याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनका एकमात्र अपराध धार्मिक अभिव्यक्ति के अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग करना था, जो अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षित है। उन्होंने अदालत में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के बिजॉय इमानुएल बनाम केरल राज्य मामले (1986) के निर्णय के अनुसार, धार्मिक आस्था के तहत किए गए निष्क्रिय कार्य भी संविधान द्वारा संरक्षित हैं।

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संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को झूठे मामलों में फंसाना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता), अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव न होने) के उल्लंघन के समान है। उनका यह भी दावा है कि इस तरह के आरोप भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि धार्मिक अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकारों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। अदालत अब इस याचिका पर सुनवाई करेगी और तय करेगी कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर और गिरफ्तारियां वैध हैं या नहीं।

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