यूपी की धर्मनगरी कार्तिक पूर्णिमा तक गुलजार, दान- स्नान का शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

Kartik Purnima 2025: उत्तर प्रदेश की धर्मनगरी पांच नवंबर कार्तिक पूर्णिमा तक गुलजार रहेगी। सनातन में आस्था रखने वालों के लिए कार्तिक मास का विशेष महत्व होता है। उसमें भी पूर्णिमा तो खास होता है।

Kartik Purnima 2025: अयोध्या, काशी, मथुरा, नैमिषारण्य, चित्रकूट, बिठूर व सुल्तानपुर जिले की विजेथुआ महावीरन मंदिर आदि तीर्थस्थलों पर वैसे तो पूरे कार्तिक माह में मेला जैसा माहौल रहता है, लेकिन बड़ी एकादशी (देव उठनी एकादशी) से लेकर कार्तिक पूर्णिमा (देव दीपावली) तक दीपदान, भजन-कीर्तन और परिक्रमा आदि के विशेष आयोजन होते हैं। इस वर्ष 5 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा है। मथुरा के बरसाने, गोवर्धन व वृंदावन आदि में विदेश से आए लखों भक्त दर्शन पूजन के साथ जहां दीपदान व परिक्रमा आदि कर रहे हैं वहीं वृंदावन के छठीकरा मार्ग पर चंद्रोदय मंदिर में देश विदेश के हजारों भक्तों की मजूदगी में धार्मिक आयोजन किए जा रहे है।

5 नवम्बर को भव्य देव दीपावली

प्रदेश के सभी धर्म नगरी के साथ सुल्तानपुर जिले के विजेथुआ महावीरन मंदिर परिसर में भी 5 नवम्बर को भव्य देव दीपावली मनाई जाएगी। यहां श्री हनुमान जन्मोत्सव के शुभ अवसर पर 10 से 19 अक्टूबर तक विजेथुआ महोत्सव आयोजित किया गया था। कार्तिक माह भगवान विष्णु, भगवान शिव, और माता तुलसी की उपासना का होता है। विशेष रूप से देवउठनी एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक के पांच दिन (पंच दिवसीय पर्व) का धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व उत्तर प्रदेश के प्रत्येक तीर्थस्थल पर अत्यंत भव्य रूप में मनाया जाता है। देवउठनी एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु चार महीने के योगनिद्रा से जागते हैं।

मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत

इस दिन अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, नैमिषारण्य, चित्रकूट आदि स्थलों पर विष्णु सहस्त्रनाम, तुलसी विवाह और दीपदान का विशेष आयोजन होता है। इस दिन से विवाह, मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत मानी जाती है। कार्तिक चतुर्दशी का दिन भगवान शिव, विष्णु और सूर्य की उपासना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। वाराणसी में गंगा घाटों पर लाखों दीपों से “देव दीपावली” मनाई जाती है।

अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट, बिठूर, मथुरा, आदि तीर्थस्थलों पर भी दीपदान, भजन-कीर्तन और मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा को भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है।

नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा का आरंभ

अयोध्या की पंचकोसी परिक्रमा, नैमिषारण्य की 84 कोसी परिक्रमा और वृंदावन व गोवर्धन आदि की परिक्रमा कार्तिक मास में विशेष फलदाई है। अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है और यहाँ की परिक्रमा का विशेष महत्व त्रेतायुग से माना गया है। मान्यता है कि कार्तिक मास में अयोध्या की परिक्रमा करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट होते हैं। यह परिक्रमा “अयोध्या परिक्रमा” या “पंचकोसी परिक्रमा” के नाम से प्रसिद्ध है। यह परिक्रमा कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) के अवसर पर की जाती है।

श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का प्रतीक है ब्रज परिक्रमा

मथुरा, अयोध्या, वाराणसी और नैमिषारण्य न केवल धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पूजनीय हैं, बल्कि इन चारों तीर्थों की परिक्रमा का महत्व भी असंख्य जन्मों के पापों का नाश करने वाला माना गया है। 84 कोस की ब्रज परिक्रमा भगवान श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का प्रतीक है। शास्त्रों में वर्णन है कि नैमिषारण्य क्षेत्र 84 कोस के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यह 84 कोसी परिधि तीर्थमंडल कहलाता है। इसी क्षेत्र में अनेक तीर्थ, जैसे चक्रतीर्थ, व्यास गद्दी, ललिता देवी, हनुमानगढ़ी, बालाजी धाम, देवतीर्थ, पवित्र गोमती उद्गम आदि स्थित हैं। प्राचीन मान्यता है कि नैमिषारण्य वह एकमात्र क्षेत्र है जहाँ कलियुग का प्रभाव नहीं है।

देवताओं ने कालचक्र को पृथ्वी पर गिराया था, और जहाँ वह धरती में समा गया, वही स्थान नैमिषारण्य कहलाया। वैसे तो यहां परिक्रमा वर्ष भर होती है, किन्तु कार्तिक मास, माघ मास और पूर्णिमा तिथियों में विशेष रूप से लाखों श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं। कार्तिक मास में भगवान विष्णु “नैमिष चक्रतीर्थ” में विशेष रूप से पूजित होते हैं।

ऐसा माना जाता है कि कार्तिक में परिक्रमा करने से सहस्र अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है। भक्त इस समय 12 कोसी परिक्रमा करते हैं, जिसे “नैमिष क्षेत्र परिधि” भी कहा जाता है। कार्तिक में नैमिष तीर्थ में स्नान व परिक्रमा करने से सब पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

लेखक-: अशोक कुमार मिश्र (वरिष्ठ पत्रकार)

 

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