वंदे मातरम् पर संसद की गर्मागर्म बहस, ओवैसी बोले—‘जबरदस्ती संविधान के खिलाफ’

Parliament Winter Session: लोकसभा में सोमवार को ‘वंदे मातरम्’ पर हुई विशेष चर्चा के दौरान सदन में सत्ता और विपक्ष के बीच शब्दों की गर्मी साफ़ दिखाई दी। बहस में AIMIM, बीजेपी, सपा और निर्दलीय सांसदों ने अपने-अपने दृष्टिकोण रखते हुए राष्ट्रगीत से जुड़े संवैधानिक, धार्मिक और सामाजिक पहलुओं पर जोर दिया।

ओवैसी का आरोप—‘वंदे मातरम् अनिवार्य कराना संविधान के खिलाफ’
AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वंदे मातरम् बोलने के लिए किसी पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि:

“हुकूमत ज़बरदस्ती न करे। वंदे मातरम् को अनिवार्य कराना संविधान के खिलाफ है।”

ओवैसी ने यह भी कहा कि भारत को आज़ादी इसलिए मिली क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नेताओं ने धर्म और राष्ट्र को एक नहीं होने दिया। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह वंदे मातरम् को “वफ़ादारी की परीक्षा” बनाने की कोशिश कर रही है।

धार्मिक मत भी रखा

उन्होंने कहा:

“इस्लाम में अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं होती। हम अपनी मां की या कुरान की भी इबादत नहीं करते।”

ओवैसी के अनुसार वतनप्रेम को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, और न ही इसे किसी समुदाय पर थोपना चाहिए।

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बीजेपी का पलटवार—‘यही मानसिकता शाहबानो से लेकर UCC विरोध तक’
बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या ने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा इसलिए जरूरी है ताकि देश का युवा अतीत की गलतियों से सीख ले।
उन्होंने कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा:

“तुष्टीकरण कांग्रेस की नीति रही है। शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना उसी मानसिकता का परिणाम था।”

सूर्या ने आरोप लगाया कि यही मानसिकता वंदे मातरम्, समान नागरिक संहिता (UCC) और SIR (मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण) का विरोध कर रही है।

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इकरा चौधरी का सवाल—‘जब हवा-पानी जहरीले हैं तो ‘सुजलाम-सुफलाम’ कैसे?’
सपा सांसद इकरा चौधरी ने राष्ट्रगीत के अर्थ को पर्यावरणीय संकट से जोड़ते हुए कहा:

“यमुना का पानी जहरीला है, दिल्ली की हवा 20 सिगरेट रोज पीने जैसी हो गई है। जब पानी और हवा ही दूषित हैं तो ‘सुजलाम-सुफलाम’ की भावना कैसे पूरी होगी?”

उन्होंने कहा कि बिना पर्यावरण सुधार के राष्ट्रगीत के वास्तविक भाव को समझना मुश्किल है।

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