लखनऊ में इलाज बना अभिशाप, डॉक्टर की लापरवाही से युवक हुआ अपाहिज

Lucknow News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार से एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जहां इलाज की आस लेकर अस्पताल पहुंचे एक युवक की ज़िंदगी कथित मेडिकल नेग्लिजेंस की भेंट चढ़ गई।

Lucknow News: लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में कथित मेडिकल लापरवाही से एक युवक की ज़िंदगी तबाह होने का मामला अब सिर्फ अस्पताल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर भी बड़ा सवाल बन गया है। खरगापुर, कौशलपुरी निवासी 35 वर्षीय नीरज मिश्रा पिछले तीन साल से न्याय की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन सरकार और स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।

तीन साल पहले हुआ था हादसा

नीरज मिश्रा तीन साल पहले बैटरी रिक्शा दुर्घटना में मामूली घायल हुए थे। इलाज के लिए जब वे गोमतीनगर विस्तार स्थित एक निजी अस्पताल पहुंचे, तो वहां उनके पैर की सर्जरी की गई। आरोप है कि गलत ऑपरेशन के कारण उनके पैर में गंभीर संक्रमण फैल गया। इसके बाद 9 से 10 सर्जरी के बावजूद उनका पैर नहीं बच सका और आज वह चलने-फिरने में असमर्थ हो चुके हैं।

पीड़ित नीरज का आरोप है कि उन्होंने इस मामले में उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक को 13 बार लिखित शिकायत भेजी। इसके अलावा सीएमओ लखनऊ, अपर निदेशक स्वास्थ्य, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक भी अपनी फरियाद पहुंचाई, लेकिन किसी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

नीरज का दावा है कि जिस अस्पताल पर आरोप हैं, उसे सिर्फ रिकॉर्ड में बंद दिखा दिया गया, जबकि न तो अस्पताल प्रबंधन पर कोई कानूनी कार्रवाई हुई और न ही पीड़ित को कोई मुआवजा या पुनर्वास मिला।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब मामला सीधे स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा, तब भी क्यों स्वास्थ्य विभाग ने मेडिकल ऑडिट, डॉक्टरों की जवाबदेही और एफआईआर जैसी प्रक्रिया शुरू नहीं की?

आज नीरज मिश्रा आर्थिक तंगी, इलाज के कर्ज और अपंगता के साथ जिंदगी काट रहे हैं, जबकि सरकारी फाइलें कथित तौर पर सिर्फ एक और “शिकायत संख्या” बनकर रह गई हैं।

यह मामला निजी अस्पतालों की मनमानी और सरकारी निगरानी तंत्र की चुप्पी का उदाहरण बनता जा रहा है। अब सवाल यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं, बल्कि यह है कि सरकार कब इस पीड़ित को इंसाफ दिलाएगी?

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