खेती में क्रांति! मिटटी में नहीं… हवा में उगे आलू, पैदावार ने तोड़े रिकॉर्ड

Potato Farming Techniques: कृषि जगत में एक क्रांतिकारी बदलाव सामने आया है। अब आलू की खेती के लिए न तो खेत की जरूरत है और न ही मिट्टी की। ग्वालियर स्थित राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए हवा में आलू उगाने में बड़ी सफलता हासिल की है। इसका वीडियो सामने आने के बाद यह तकनीक किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गई है।

हवा में लटकते पौधे, जड़ों में हजारों आलू
एरोपोनिक्स पद्धति में आलू के पौधों को जमीन में लगाने के बजाय हवा में लटकाया जाता है। पौधों की जड़ों पर विशेष पोषक तत्वों का स्प्रे किया जाता है। इसी प्रक्रिया से एक ही पौधे की जड़ों में 50 से 1000 तक छोटे-छोटे आलू विकसित हो रहे हैं। ये सभी आलू पूरी तरह वायरस मुक्त होते हैं, जिससे बीज की गुणवत्ता बेहद उच्च स्तर की होती है।

1 किलो बीज से 400 किलो तक उत्पादन
वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक खेती में जहां 1 किलो बीज से औसतन 20 से 25 किलो आलू की पैदावार होती है, वहीं एरोपोनिक्स तकनीक से 1 किलो बीज से 350 से 400 किलो तक उत्पादन संभव है। यही वजह है कि इसे आलू उत्पादन में गेम चेंजर माना जा रहा है।

बीज आलू तैयार करने में अहम भूमिका
इस तकनीक से तैयार किए गए आलू मुख्य रूप से बीज के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जड़ों में उगे इन छोटे आलुओं को सावधानीपूर्वक निकालकर वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस किया जाता है, ताकि किसान उन्हें खेतों में रोपण के लिए इस्तेमाल कर सकें। इससे आलू की फसल में बीमारी फैलने का खतरा बेहद कम हो जाता है।

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कम लागत, ज्यादा मुनाफा
एरोपोनिक्स पद्धति से पानी की खपत 90 प्रतिशत तक कम हो जाती है और कीटनाशकों की लगभग जरूरत नहीं पड़ती। इससे लागत घटती है और किसानों को मुनाफा ही मुनाफा होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले समय में यह तकनीक छोटे और बड़े दोनों तरह के किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी।

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भविष्य की खेती की झलक
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि बदलते मौसम, घटती जमीन और बढ़ती आबादी के बीच एरोपोनिक्स जैसी तकनीकें खेती का भविष्य तय करेंगी। अगर इसे बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ेगी बल्कि देश में आलू के बीज की गुणवत्ता और उपलब्धता भी बेहतर होगी।

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