Europe में 10 हजार मौतों का रहस्य! क्या ‘हीटडोम’ के पीछे छिपा है जलवायु का सबसे बड़ा खतरा?

Heat Dome in Europe: यूरोप में जून के अंत में पड़ी भीषण गर्मी ने एक बार फिर दुनिया को जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरे की चेतावनी दे दी है। अत्यधिक तापमान और लंबे समय तक जारी हीटवेव के कारण 10 हजार से अधिक लोगों की मौत की खबर सामने आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप जिस तरह की गर्मी का सामना कर रहा है, उसके लिए न तो वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार था और न ही बड़ी संख्या में लोग इस स्तर की गर्मी से निपटने के लिए तैयार थे।

यूरोप को अब दुनिया के सबसे तेजी से गर्म हो रहे महाद्वीपों में से एक माना जा रहा है। हालिया गर्मी ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए तत्काल और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हालात और भी भयावह हो सकते हैं।

क्या है ‘हीटडोम’ और कैसे फंसती है गर्म हवा?
विशेषज्ञों के मुताबिक, यूरोप में इस बार अत्यधिक गर्मी के पीछे कई मौसमी और जलवायु संबंधी कारण जिम्मेदार हैं। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ने और वातावरण में लगातार बने उच्च दबाव के कारण गर्म हवा यूरोप के ऊपर फंस गई।

इस स्थिति को आमतौर पर ‘हीटडोम’ कहा जाता है। इसमें गर्म हवा ऊपर उठने के बजाय एक बड़े क्षेत्र में फंस जाती है और तापमान लगातार बढ़ता रहता है। गर्मी के लंबे समय तक बने रहने से इसका असर मानव स्वास्थ्य, कृषि, बिजली व्यवस्था और जल संसाधनों पर भी पड़ता है।

यूरोप के लोग इतनी गर्मी के लिए तैयार नहीं
NDTV से बातचीत में ब्रिटेन, जर्मनी और स्लोवाकिया के क्लाइमेट एक्सपर्ट्स और पर्यावरण विशेषज्ञों ने स्थिति को बेहद गंभीर बताया। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरोप की भौगोलिक और सामाजिक संरचना ऐसी भीषण गर्मी के लिए तैयार नहीं है।

यूरोप के कई हिस्सों में घरों और इमारतों का निर्माण ठंडे मौसम को ध्यान में रखकर किया गया है। यहां बड़ी संख्या में घरों में एयर कंडीशनिंग की सुविधा भी आम नहीं है। ऐसे में जब तापमान सामान्य सीमा से काफी ऊपर पहुंचता है तो लोगों के लिए गर्मी से बचना मुश्किल हो जाता है।

बुजुर्ग और कमजोर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक गर्मी का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है। लगातार बढ़ता तापमान शरीर की प्राकृतिक तापमान नियंत्रण प्रणाली पर दबाव डालता है।

हीटवेव के दौरान डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। कई मामलों में अत्यधिक गर्मी सीधे मौत का कारण न दिखकर पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीर बना देती है।

क्या जलवायु परिवर्तन है असली वजह?
क्लाइमेट एक्सपर्ट्स का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इससे हीटवेव की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यूरोप में जिस तरह की गर्मी अब देखने को मिल रही है, वह पहले असामान्य मानी जाती थी। लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते ऐसी घटनाएं अब तेजी से सामान्य होती जा रही हैं।

यह भी पढ़ें…

Balen Shah की सरकार में बढ़ी अंदरूनी खटपट! अपनी ही पार्टी के सांसदों ने घेरा

‘जलवायु इमरजेंसी’ की ओर बढ़ रही दुनिया?
यूरोप में हुई हजारों मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया अब जलवायु इमरजेंसी की ओर बढ़ रही है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह केवल भविष्य का खतरा नहीं है, बल्कि इसके संकेत आज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

विशेषज्ञों ने सरकारों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने, शहरों को हीटवेव के लिए तैयार करने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की अपील की है। साथ ही लोगों को भी गर्मी से बचाव के लिए जागरूक करने पर जोर दिया गया है।

यह भी पढ़ें…

भारत पर ट्रंप का ‘टैरिफ वार’! रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका लगा सकता है 100% शुल्क…

तुरंत कदम उठाने की जरूरत
क्लाइमेट एक्सपर्ट्स का स्पष्ट कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन पर अभी कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में हीटवेव और भी ज्यादा घातक हो सकती है। यूरोप में 10 हजार से अधिक मौतों का आंकड़ा दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

अब सवाल केवल यह नहीं है कि गर्मी क्यों बढ़ रही है, बल्कि यह है कि बढ़ते तापमान से निपटने के लिए दुनिया कितनी जल्दी और कितनी गंभीरता से कदम उठाती है।

यह भी पढ़ें…

भारतीय नाविक की मौत पर भारत का सख्त रुख, ईरानी राजनयिक को किया तलब…

Back to top button