Ad इलायची का, ब्रांडिंग तंबाकू की! क्या है सरोगेट एडवर्टाइजिंग जिसमे फंसे बॉलीवुड सितारे?

महाराष्ट्र FDA ने विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर अजय देवगन, शाहरुख खान और टाइगर श्रॉफ को नोटिस जारी किया है।

Surrogate Advertising: टीवी या सोशल मीडिया पर आपने ऐसे कई विज्ञापन देखे होंगे, जिनमें नाम तो इलायची, माउथ फ्रेशनर, सोडा, पैकेज्ड वाटर या म्यूजिक सीडी का लिया जाता है, लेकिन ब्रांड का नाम और लोगो देखते ही दर्शकों को तुरंत किसी प्रतिबंधित पान मसाले या शराब की याद आ जाती है। विज्ञापन की इस चतुर रणनीति को सरोगेट विज्ञापन’ (Surrogate Advertising) या अप्रत्यक्ष विज्ञापन कहा जाता है।

हाल ही में महाराष्ट्र एफडीए (FDA) द्वारा बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को ‘विमल इलायची’ के विज्ञापन को लेकर भेजे गए कारण बताओ नोटिस के बाद यह मुद्दा एक बार फिर देश भर में चर्चा का विषय बन गया है।

सरोगेट विज्ञापन क्या होता है? (What is Surrogate Advertising?)

आसान शब्दों में समझें तो जब सरकार या कानून किसी उत्पाद (जैसे तंबाकू, पान मसाला, गुटखा या शराब) के सीधे विज्ञापन पर प्रतिबंध या कड़े नियम लगा देता है, तब कंपनियां एक नया पैंतरा अपनाती हैं। 

कंपनी उसी ब्रांड नाम, लोगो, रंग, पैकेजिंग और पंचलाइन के साथ कोई ऐसा उत्पाद बाजार में पेश करती है, जिस पर विज्ञापन की कोई पाबंदी नहीं होती (जैसे इलायची, सोडा या पानी)।

इसके बाद टीवी और डिजिटल मीडिया पर उस ‘वैध’ प्रोडक्ट का प्रचार बड़े सितारों से कराया जाता है। विज्ञापन का अंदाज और ब्रांड नेम ऐसा रखा जाता है कि उपभोक्ता के दिमाग में तुरंत उस बैन या प्रतिबंधित प्रोडक्ट की तस्वीर उभर आती है।

नोटिस के फेर में फंसे बॉलीवुड सितारे?

बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन काफी समय से ‘विमल’ ब्रांड से जुड़े रहे हैं, जबकि बाद में शाहरुख खान और फिर टाइगर श्रॉफ भी इस कैंपेन का हिस्सा बने। महाराष्ट्र में स्वास्थ्य कारणों से तंबाकू और गुटखा युक्त पान मसाले की बिक्री व प्रचार पर प्रतिबंध लागू है।

FDA का तर्क है कि ‘विमल इलायची’ का प्रचार वास्तव में प्रतिबंधित विमल पान मसाला की ब्रांड पहचान को ही अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत करने का जरिया है। एफडीए ने तीनों अभिनेताओं को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर लिखित स्पष्टीकरण मांगा है और सोशल मीडिया से इस विज्ञापन के कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया है।

कंपनियां क्यों अपनाती हैं ये रणनीति?

जब मुख्य उत्पाद का सीधा विज्ञापन संभव नहीं होता, तो सरोगेट एडवर्टाइजिंग के जरिए ब्रांड का नाम लोगों के दिमाग में जिंदा रखा जाता है। कंपनियां दावा करती हैं कि वे केवल इलायची या पानी बेच रही हैं, जिससे वे विज्ञापन नियमों की बारीकियों का फायदा उठाकर बच निकलती हैं।

क्या सरोगेट विज्ञापन गैर-कानूनी है?

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) और भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि कोई विज्ञापन प्रतिबंधित वस्तु का अप्रत्यक्ष प्रचार करता पाया जाता है या उपभोक्ताओं को गुमराह करता है, तो वह सरोगेट एडवर्टाइजिंग की श्रेणी में आता है और कानूनी जांच के दायरे में आ सकता है।

आलोचकों और जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के विज्ञापन युवाओं और बच्चों के मन में तंबाकू और शराब जैसी आदतों को लेकर आकर्षण पैदा करते हैं, इसलिए इन पर सख्ती से रोक लगनी चाहिए।

Back to top button