
हलषष्ठी व्रत विधि और बलराम जयंती कथा, जानिए पूजा की सामग्री और नियम
Hal Sashti Vrat Katha 2026: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे भारत में हलषष्ठी, हरछठ, ललही छठ या तिन्नी छठ के रूप में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है, इसलिए उन्हें ‘हलधर’ भी कहा जाता है। उन्हीं के नाम पर इस व्रत का नाम हलषष्ठी पड़ा है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए यह निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं।
हलषष्ठी व्रत की सरल पूजा विधि
-
हलषष्ठी के दिन महिलाएं सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेती हैं।
-
घर की दीवार पर गोबर से हरछठ माता का चित्र बनाया जाता है। इसमें गणेश-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, सूर्य-चंद्रमा और गंगा-यमुना आदि की आकृतियां उकेरी जाती हैं।
-
पूजा स्थान के पास कमल के फूल, छूल (पलाश) के पत्ते और हल्दी से रंगा कपड़ा रखा जाता है।
-
हलषष्ठी की पूजा में पसाई के चावल (तिन्नी का चावल), महुआ, गाय के दूध के बजाय भैंस का दूध व दही अर्पित किया जाता है।
-
पूजा में सात प्रकार के भुने हुए अनाज (सतनजा) चढ़ाए जाते हैं, जिसमें गेहूं, चना, मटर, मक्का, ज्वार, बाजरा और अरहर शामिल होते हैं।
-
पूजा के बाद हलषष्ठी माता की कथा सुनी जाती है और आरती उतारी जाती है।
हलषष्ठी (हरछठ) व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी, तो दूसरी ओर उसका मन दूध-दही बेचने में लगा था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो दूध-दही खराब हो जाएगा। यह सोचकर वह दूध-दही का घड़ा सिर पर रखकर बेचने निकल पड़ी।
रास्ते में असहनीय प्रसव पीड़ा होने पर वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां उसने एक बालक को जन्म दिया। वह नवजात शिशु को वहीं छोड़कर पास के गांव में दूध बेचने चली गई। उस दिन हलषष्ठी थी। उसने छलपूर्वक गाय और भैंस के मिले-जुले दूध को केवल भैंस का दूध बताकर गांव की महिलाओं को बेच दिया, जिससे उनका धर्म भ्रष्ट हो गया।
उधर, जिस झरबेरी के नीचे बालक था, उसके पास खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल लगने से वह बालक मर गया। किसान बहुत दुखी हुआ, उसने हिम्मत जुटाकर झरबेरी के कांटों से बालक के पेट में टांके लगाए और वहां से चला गया।
जब ग्वालिन लौटी और बच्चे की यह दशा देखी, तो उसे समझ आ गया कि झूठ बोलकर गांव वालों का धर्म भ्रष्ट करने के पाप की सजा ही उसे मिली है। उसने तुरंत प्रायश्चित करने का फैसला किया। वह वापस गांव पहुंची और गली-गली घूमकर अपने पाप का बखान करने लगी। गांव की महिलाओं ने उसके सच बोलने पर उसे क्षमा किया और आशीर्वाद दिया।
जब वह ग्वालिन पुनः झरबेरी के पास पहुंची, तो उसने देखा कि उसका पुत्र जीवित और स्वस्थ पड़ा है। उस दिन के बाद से उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्महत्या के समान समझा और सदैव सत्य बोलने का प्रण लिया।
हलषष्ठी व्रत का महत्व
इस व्रत में हल से जोते गए खेत का कोई भी अन्न या फल नहीं खाया जाता। केवल तालाब या प्राकृतिक रूप से उगने वाले तिन्नी के चावल और पसई की वस्तुओं का सेवन होता है। इस दिन गाय के दूध, दही या घी का प्रयोग पूरी तरह वर्जित माना गया है। केवल भैंस के दूध-दही का उपयोग किया जाता है।





