
भगवान भोले का महात्म्य, शिवलिंग पर जल व बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व…
Worship of Shiva: भगवान शिव का विशेष महात्म्य है। सिर्फ काशी ही नहीं बल्कि दुनिया के किसी कोने में हों हिंदू परिवार इस सावन मास में शिवलिंग पर जल व बिल्व पत्र जरूर चढ़ाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अनजाने में भी इस दिन शिवलिंग पर जल व बिल्व पत्र चढ़ जाए तो उसे शिवलोक मिलता है। तो जानते हैं क्या है शिव महात्म्य…
लखनऊ विश्वविद्यालय में ज्योतिर्विज्ञान के प्रोफेसर डॉ अनुज शुक्ला ने अनुसार लिंग सृष्टि का आधार है और शिव विश्व कल्याण के देवता है। रूद्र को अभिषेकप्रियः कहा गया है यानि उन्हे अभिषेक सबसे ज्यादा प्रिय है। इसलिए सावन के महीने में शिव का अभिषेक किया जाता है। सामान्यतः लोग जल से अभिषेक करते है और समृद्ध लोग दूध, शहद दही, आदि अनके द्रव्यों से अभिषेक करते है। मान्यता है कि श्रावण मास में शिव ने समुद्र मन्थन से उत्पन्न विष को जनकल्याण के लिए ग्रहण किया था, तब इन्द्र ने प्रसन्न होकर शीतलता प्रदान करने के लिए वर्षा ऋतु में वर्षा की थी, इसी कारण श्रावण मास में शिव जी को जल अर्पित करने की परम्परा शुरू हुयी।

शिवलिंग का पुराणों में उल्लेख
स्कन्द पुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं लिंग है, धरती उसकी पीठ व आधार है और सब अन्नत शून्य में उत्पन्न हुये है व उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा गया है।
शिवलिंग मुख्यतः ग्यारह प्रकार के होते है। जो प्रथम स्थान पर रूद्री रूपी ज्योतिंर्लिंग है। यह भारत के सभी शक्ति पीठों में पूजा जाता है। शास्त्रों में शिवलिंग की महत्ता का बखान करते हुये कहा गया है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मिट्टी से शिवलिंग बनाकर विधिवत पूजन-अर्चन करता है, उसकी सारी मनोकामनायें पूर्ण होती है
नीलकंठ भी कहा जाता है
शिव को देवों का देव महादेव कहा जाता है। शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से है। वेदों में इन्हें रूद्र नाम से पुकारा गया है। यह चेतना के अन्र्तयामी है और इनकी अर्द्धागिंनी माॅ पार्वती है। शिव के मस्तक में चन्द्रमा तथा जटाओं में माॅ गंगा का वास है। जन कल्याण के लिए शंकर ने विष का पान किया था जिससे उनका कण्ठ नीला पड़ गया था। इसलिए शंकर को नीलकंठ भी कहा जाता है। शिव सौम्य आकृति व रूद्र रूप देानों के लिए विख्यात है। शिव चित्रों में योगी के रूप में नजर आते है। इसलिए शिव जी की पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूप में की जाती है।
दशों दिशाओं में अपनी कल्याणकारी उर्जा का प्रवाह करने वाले शिव सभी के लिए सहज व सरल है। लेकिन शिव अगर कल्याणकरी है तो संहारक भी है। शक्ति और साधना के प्रतीक शिव के 28 अवतारों का उल्लेख पुराणों में मिलता है, किन्तु उनमें से 10 अवतारों की प्रमुखता से चर्चा होती है। जो निम्न प्रकार से है-महाकाल, तारा, बाल भुवनेश्वर, षोडश श्री विद्येश, भैरव, छिन्नमस्तक, द्यूमवान, बगलामुखी, मातंग, कमल आदि। अतः भगवान शिव का प्रभाव दशों दिशाओं में रहता है।
Article By-
Dr. Anuj Shukla LU: डॉ अनुज शुक्ल
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, ज्योतिर्विज्ञान, लखनऊ विश्वविद्यालय





