चुनाव में बुरी पराजय का असर: SKM में बढ़ी रार, टूट सकता है संगठन

skm meeting

नई दिल्ली। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा का खुलकर बहिष्कार करने को कहने वाले संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) में तकरार तेज हो गई है।

इन चुनावों में जनता द्वारा बुरी तरह से नकारे जाने के बाद मोर्चे के पदाधिकारी अब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।      

दरअसल यह बात तब सामने आई जब चुनाव बाद पहली बार दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में मोर्चे के पदाधिकारी जुटे इस जुटान में पदाधिकारियों की बीच खूब रार हुई।

सोमवार को गुटों में बंटकर हुई इस बैठक में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का दौर भी खूब चला। कई बार नौबत हाथापाई तक की आती दिखाई दी, लेकिन बीचबचाव कर मामला संभाल लिया गया।

विशेष बात यह रही कि बैठक में वामपंथी नेता अतुल अंजान के साथ अन्य सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि संयुक्त किसान मोर्चा में आपसी फूट कभी भी सार्वजनिक रूप से सामने आ सकती है।

गौरतलब है कि उप्र, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव में संयुक्त किसान मोर्चा ने भाजपा को हराने की अपील की थी।

उसे उम्मीद थी कि उसका बहिष्कार भाजपा के विजय रथ को रोक देगा और उसका कंधा लेकर विपक्षी दल जीत दर्ज करेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके उलट चुनाव में मतदाताओं का सत्ता पक्ष की ओर ही रुझान रहा।

यही कारण रहा कि पांच में चार राज्यों (उप्र, उत्तराखंड, गोवा व मणिपुर) में भाजपा ने जोरदार तरीके से जीत दर्ज की और कई मिथक टूट गए।

बैठक में आंदोलन से उपजे आक्रोश को भुनाने के लिए मोर्चा के एक गुट द्वारा राजनीतिक पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने के मामले को लेकर भी टकराव देखने को मिला।

राजनीतिक दल बनाकर पंजाब में चुनाव लड़ने वाले मोर्चा के नेता बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी को मोर्चा से बाहर का रास्ता दिखाने के पक्ष में दूसरा गुट दिखा।

कुछ नेता इसको लेकर गांधी शांति प्रतिष्ठान के मुख्य हाल के बाहर बैठक करने लगे। इसमें मोर्चा के नेता योगेंद्र यादव, दर्शन पाल सिंह और हन्नान मोल्ला शामिल थे।

वहीं, दूसरा गुट इस संबंध में दबे स्वर से योगेंद्र यादव पर सवाल उठा रहा था, जिनकी खुद की एक राजनीतिक पार्टी है।

इस बीच संगठन से जुड़े कार्यकर्ता असमंजस में थे कि वो किस गुट में शामिल हों। फिलहाल योगेंद्र यादव वाले गुट की ओर से संगठन में अनुशासन के लिए एक मसौदा तैयार करने का प्रस्ताव दिया गया है। उसे सभी गुट के नेताओं को भेजा जाएगा।

गौरतलब है कि 10 मार्च को उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में 4 में भाजपा की दमदार वापसी हुई। यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है।

हैरत की बात है कि किसान संगठनों के प्रभाव वाले पश्चिमी उप्र और उत्तराखंड में किसान आंदोलन का बिलकुल भी असर नहीं दिखाई दिया और यहां भाजपा को भर-भर के वोट मिला। दिल्ली से सटे जिन इलाकों में किसान आंदोलन अधिक प्रभावी रहा वहां की सभी 11 सीटों पर भाजपा बड़े अंतर से जीती।

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