ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, समान अवसर नीति पर कमेटी करेगी काम

Suprime Court: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ट्रांसजेंडर महिला शिक्षक के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान के आधार पर उसे रोजगार से वंचित करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इस मामले में कोर्ट ने शिक्षक को मुआवजा देने के साथ ही सरकार को ठोस नीति बनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

दरअसल, यह मामला एक ट्रांसजेंडर महिला शिक्षक से जुड़ा है, जो उत्तर प्रदेश और गुजरात के दो निजी स्कूलों में कार्यरत थी। शिक्षक को उसकी लैंगिक पहचान के चलते दोनों स्कूलों से निकाल दिया गया था। शिक्षक ने इसके खिलाफ अदालत में गुहार लगाई थी। इस याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही थी।

अदालत ने कहा — “लैंगिक पहचान पर भेदभाव बर्दाश्त नहीं”
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रांसजेंडर और जेंडर डायवर्स व्यक्तियों को समान अवसर मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है। न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा, “किसी व्यक्ति की जेंडर आइडेंटिटी उसके खिलाफ भेदभाव का आधार नहीं बन सकती। रोजगार में समान अवसर देना सिर्फ एक नीति नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।”

शिक्षक को मिलेगा मुआवजा
कोर्ट ने शिक्षक को नौकरी से निकाले जाने पर मानसिक पीड़ा, सामाजिक अपमान और आर्थिक नुकसान को देखते हुए मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में किसी भी संस्था या संगठन को लैंगिक पहचान के आधार पर कर्मचारियों के साथ भेदभाव करने की अनुमति नहीं होगी।

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बनेगी हाई-लेवल कमेटी
कोर्ट ने ट्रांसजेंडर और जेंडर डायवर्स व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। इस समिति की अध्यक्षता दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज आशा मेनन करेंगी। इसमें ट्रांस राइट्स एक्टिविस्ट्स, सामाजिक न्याय, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालयों के सचिव शामिल होंगे।

यह समिति रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिकायत निवारण तंत्र, जेंडर और नाम बदलने की प्रक्रिया, तथा ट्रांसजेंडरों के लिए सुविधाओं पर काम करेगी। समिति 2019 के ट्रांसजेंडर एक्ट और 2020 के नियमों की समीक्षा भी करेगी।

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रोजगार में समान अवसर की दिशा में बड़ा कदम
कोर्ट के इस फैसले को ट्रांसजेंडर अधिकारों की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस निर्णय से न केवल समान अवसर को लेकर नीति स्पष्ट होगी बल्कि जेंडर आधारित भेदभाव को रोकने में भी मदद मिलेगी।

कोर्ट ने सरकार को जल्द से जल्द इस मामले में स्पष्ट नीति लाने के निर्देश दिए हैं ताकि ट्रांसजेंडर समुदाय को शिक्षा और रोजगार में समान भागीदारी मिल सके।

न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा: “समाज में समावेशिता तभी संभव है जब सभी को बिना भेदभाव समान अवसर मिले। ट्रांसजेंडर समुदाय को सम्मान और समानता का अधिकार है।”

यह फैसला देश भर में ट्रांसजेंडर और जेंडर डायवर्स व्यक्तियों के लिए आशा की किरण के रूप में देखा जा रहा है। सामाजिक संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे “ऐतिहासिक मील का पत्थर” बताया है।

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