Rahul Gandhi के प्रदर्शन से क्यों नाराज़ हुई AAP? कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप…

AAP on Rahul Gandhi Protest: राहुल गांधी के नेतृत्व में हुए हालिया विरोध प्रदर्शन के बाद विपक्षी राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) ने कांग्रेस पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ “मिलीभगत” का आरोप लगाते हुए विपक्षी एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार ने राहुल गांधी के धरने पर जिस तेजी से प्रतिक्रिया दी, वही संवेदनशीलता अन्य विपक्षी आंदोलनों के प्रति कभी नहीं दिखाई गई।

इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो गई है कि क्या विपक्षी दलों के बीच भरोसे की कमी बढ़ रही है और क्या भविष्य में विपक्ष की साझा रणनीति पर इसका असर पड़ सकता है।

क्या है पूरा मामला?
राहुल गांधी ने हाल ही में अपने आधिकारिक आवास के बाहर धरना देकर केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक राजनीतिक और मीडिया कवरेज मिला। इसके बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने सवाल उठाया कि सरकार ने इस प्रदर्शन पर तुरंत प्रतिक्रिया दी, जबकि जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चले अन्य आंदोलनों को नजरअंदाज किया गया।

AAP नेताओं ने विशेष रूप से सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जंतर-मंतर पर कई सप्ताह तक चले आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन आंदोलनों के दौरान सरकार की ओर से कोई गंभीर पहल या संवाद नहीं हुआ। पार्टी का आरोप है कि सरकार का यह अलग-अलग रवैया कई सवाल खड़े करता है।

AAP ने कांग्रेस पर क्या आरोप लगाए?
आम आदमी पार्टी के नेताओं का कहना है कि कांग्रेस और बीजेपी के बीच “अंदरखाने कोई राजनीतिक समझ” दिखाई दे रही है। उनका दावा है कि राहुल गांधी के धरने पर सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया और अन्य आंदोलनों की अनदेखी इस धारणा को मजबूत करती है।

AAP का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का सम्मान करती है, तो उसे सभी आंदोलनों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए, चाहे प्रदर्शन किसी भी राजनीतिक दल या संगठन का हो।

हालांकि कांग्रेस और बीजेपी की ओर से इन आरोपों पर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

AAP और कांग्रेस के रिश्तों का इतिहास
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। वर्ष 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। उस चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन बहुमत से दूर थी। आम आदमी पार्टी को 28 सीटें और कांग्रेस को 8 सीटें मिली थीं।

उस समय कांग्रेस ने बाहर से समर्थन देकर अरविंद केजरीवाल को पहली बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया। हालांकि यह सरकार केवल 49 दिनों तक चली और उसके बाद दोनों दलों के रिश्तों में लगातार दूरी बढ़ती गई।

इसके बाद आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनाकर चुनाव लड़े और धीरे-धीरे कांग्रेस का जनाधार अपने पक्ष में कर लिया। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दिल्ली में लगभग हाशिये पर पहुंच गई।

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विपक्षी एकता पर असर?
हाल के वर्षों में कई राष्ट्रीय मुद्दों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने एक-दूसरे के साथ मंच साझा किया है, लेकिन दोनों दलों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई राज्यों में दोनों दल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर कई अवसरों पर सहयोग की भी कोशिशें हुई हैं।

राहुल गांधी के धरने को लेकर AAP की तीखी प्रतिक्रिया ने यह संकेत दिया है कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब भी बरकरार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे, तो विपक्ष की साझा रणनीति और एकजुटता प्रभावित हो सकती है।

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राजनीतिक संदेश और आगे की रणनीति
AAP का यह रुख केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि अपने समर्थकों को यह संदेश देने की भी कोशिश माना जा रहा है कि पार्टी स्वतंत्र राजनीतिक लाइन पर चल रही है और किसी भी दल के प्रति नरम रुख अपनाने के पक्ष में नहीं है। वहीं कांग्रेस अपने आंदोलनों को सरकार के खिलाफ जनआवाज बताकर विपक्षी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने का प्रयास कर रही है।

आने वाले दिनों में यदि कांग्रेस और AAP के बीच यह बयानबाजी और तेज होती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ उन राज्यों में भी देखने को मिल सकता है, जहां दोनों दल सीधे राजनीतिक मुकाबले में हैं। फिलहाल, राहुल गांधी के धरने को लेकर शुरू हुआ यह विवाद विपक्षी खेमे के भीतर नई बहस और राजनीतिक खींचतान का कारण बन गया है।

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