ग्रीनलैंड पर क्यों टिकी है ट्रंप की नजर? हर कीमत पर कब्जे को लेकर दिया बड़ा बयान

Donald Trump: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख अपनाते नजर आ रहे हैं। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को “आसान तरीके” से हासिल नहीं कर पाया, तो वह “मुश्किल तरीका” भी अपना सकता है। इस बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है या फिर ग्रीनलैंड में मौजूद बेशकीमती संसाधनों ने ट्रंप की दिलचस्पी बढ़ा दी है?

राष्ट्रीय सुरक्षा क्यों है सबसे बड़ा तर्क?
ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से अमेरिका के लिए बेहद रणनीतिक स्थान पर स्थित है। यह आर्कटिक सर्कल में नॉर्थ पोल के बेहद करीब है, जो अमेरिका की रक्षा रणनीति की रीढ़ माना जाता है। ग्रीनलैंड में स्थित अमेरिका का Pituffik Space Base (पूर्व में थुले एयर बेस) मिसाइल चेतावनी प्रणाली, स्पेस सर्विलांस और सैटेलाइट ट्रैकिंग में अहम भूमिका निभाता है।

इस लोकेशन से अमेरिका रूस, यूरोप और चीन की गतिविधियों पर नज़र रख सकता है। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड के आसपास रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी अमेरिका के लिए गंभीर चिंता का विषय है और वे किसी भी सूरत में ग्रीनलैंड को चीन या रूस का प्रभाव क्षेत्र नहीं बनने देना चाहते।

रेयर अर्थ मिनरल्स और यूरेनियम का खजाना
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं दिखती। यह द्वीप आधुनिक दुनिया के सबसे कीमती संसाधनों से भरपूर माना जाता है। ग्रीनलैंड में बड़ी मात्रा में रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) पाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल मोबाइल, इलेक्ट्रिक व्हीकल, मिसाइल सिस्टम और हाई-टेक डिफेंस उपकरणों में होता है। फिलहाल इन खनिजों पर चीन का लगभग 90% तक नियंत्रण है।

इसके अलावा ग्रीनलैंड में यूरेनियम के बड़े भंडार मौजूद हैं। अमेरिका अभी यूरेनियम का एक बड़ा हिस्सा रूस से आयात करता है। ऐसे में ग्रीनलैंड अमेरिका को इस निर्भरता से मुक्त कर सकता है। यहां लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तेल और गैस जैसे संसाधन भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो भविष्य की ऊर्जा और तकनीक के लिए बेहद अहम हैं।

आर्कटिक सिल्क रोड और नया ट्रेड रू
क्लाइमेट चेंज के चलते आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री व्यापार मार्ग खुल रहे हैं। इन नए शिपिंग रूट्स को “आर्कटिक सिल्क रोड” कहा जा रहा है। इन रास्तों से एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच की दूरी हजारों किलोमीटर तक कम हो सकती है, जिससे व्यापार लागत में भारी कमी आएगी।

इन समुद्री मार्गों पर नियंत्रण का मतलब है वैश्विक व्यापार पर असर डालने की ताकत। ग्रीनलैंड इन रूट्स के बीच एक बेहद अहम रणनीतिक ठिकाना बन जाता है, यही वजह है कि अमेरिका इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में लाना चाहता है।

यह भी पढ़ें…

ईरान में अनोखा प्रदर्शन… सुप्रीम लीडर खामेनेई की तस्वीर जलाकर सिगरेट पीती महिलाएं

स्पेस और सैटेलाइट कंट्रोल की जंग
ग्रीनलैंड की लोकेशन पोलर सैटेलाइट्स के लिए भी बेहद अहम मानी जाती है। अमेरिका का फोकस तेजी से Space Warfare, Surveillance और Satellite Control की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में ग्रीनलैंड स्पेस ट्रैकिंग, मिसाइल डिफेंस और कम्युनिकेशन सिस्टम को मजबूत करने के लिए एक आदर्श स्थान है।

चीन और रूस को रोकने की रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने आर्कटिक क्षेत्र में माइनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। वहीं रूस ने भी आर्कटिक में सैन्य बेस, न्यूक्लियर आइसब्रेकर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी ताकत मजबूत की है।

अमेरिका नहीं चाहता कि ग्रीनलैंड में चीन या रूस का प्रभाव बढ़े। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन इसे हर हाल में अपने नियंत्रण में लाने की रणनीति पर काम कर रहा है।

यह भी पढ़ें…

Uranium जंग में फंसा अमेरिका… रूस पर वार, पर निर्भरता अब भी कायम

डेनमार्क से टकराव की आशंका
ग्रीनलैंड फिलहाल डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। ट्रंप यह भी कह चुके हैं कि वे डेनमार्क के “फैन” हैं, लेकिन इसके बावजूद ग्रीनलैंड को लेकर उनका रुख सख्त है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने भी संकेत दिए हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने के सभी विकल्पों पर विचार कर रहा है, जिसमें सैन्य विकल्प भी शामिल हो सकता है।

सिर्फ जमीन नहीं, भविष्य की जंग
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर यह लड़ाई सिर्फ जमीन के एक टुकड़े की नहीं है, बल्कि यह भविष्य की ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, स्पेस और ग्लोबल ट्रेड पर नियंत्रण की जंग है। ट्रंप का ताजा बयान इसी भू-राजनीतिक संघर्ष की ओर इशारा करता है, जिसने आने वाले समय में अमेरिका-यूरोप-चीन-रूस के रिश्तों को और तनावपूर्ण बना सकता है।

यह भी पढ़ें…

पाकिस्तान के मंसूबों पर फिरा पानी… गाज़ा में प्रवेश पर इजरायल की असहमति

Back to top button