
नशे में गाड़ी चलाई तो जेल,जहाज़ उड़ाया तो सिर्फ़ निलंबन!
भारत में आखिर ये कैसा कानून?
भारतीय सड़कों पर शराब या नशे की हालत में गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर को तुरंत गिरफ्तारी, आपराधिक चार्जशीट और जेल की हवा खानी पड़ती है। लेकिन, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में आज तक एक भी व्यावसायिक पायलट को नशे में फ्लाइट उड़ाने के प्रयास के लिए आपराधिक रूप से दोषी नहीं ठहराया गया है।
इससे तो यही निष्कर्ष निकालता हैं, आसमान में नशा करना कानूनी अपराध नहीं अपितु एक प्रशासनिक गलती है। शायद यही कारण है कि आज तक किसी पायलट को आपने कटघरे में नहीं देखा है।
भारतीय विमानन कानून के एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने हवाई सुरक्षा के मानकों पर बेहद सख्त रुख अपनाया था। जुलाई 2024 में, ब्रेथ-एनालाइज़र टेस्ट में फेल होने पर एक पायलट के लाइसेंस निलंबन को बरकरार रखते हुए, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि सुरक्षित उड़ान के लिए शरीर में अल्कोहल का स्तर “शून्य” होना चाहिए, जो अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO) के सुरक्षा सिद्धांतों के भी अनुकूल है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी:
“यात्रियों की सुरक्षा से किसी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता, और लापरवाह पायलट के प्रति कोई भी ढिलाई उनकी जान को खतरे में डालने जैसी होगी।”
कागजों पर अदालत का यह निर्देश बिल्कुल साफ है: कॉकपिट में शराब या किसी भी नशीले पदार्थ की एक बूंद भी सुरक्षा से खिलवाड़ और अक्षम्य अपराध है। फिर भी, अदालती आदेशों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई साफ नजर आती है।
प्रशासनिक ढिलाई की यह तस्वीर एक और संवेदनशील क्षेत्र, भारतीय रेलवे में भी देखने को मिलती है। दिसंबर 2023 में रेल मंत्रालय ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि पिछले 5 वर्षों में कराए गए करीब 8.28 करोड़ ब्रेथ-एनालाइज़र टेस्टों में से 1,761 लोको पायलट ड्यूटी जॉइन करते या खत्म करते वक्त टेस्ट में फेल पाए गए। इसके बावजूद, सिर्फ टेस्ट में फेल होने के आधार पर किसी को आपराधिक सजा मिलने के मामले न के बराबर हैं।
जब कोई ट्रेन ड्राइवर अनिवार्य ब्रेथ-एनालाइज़र टेस्ट में फेल होता है, तो भारतीय रेल, रेलवे कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1968 के तहत सिर्फ आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है। हर मामले में आपराधिक मुकदमा चलाने के बजाय ड्राइवर को ड्यूटी से हटा दिया जाता है, सस्पेंड किया जाता है, विभागीय जांच बैठाई जाती है और अक्सर नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है।
रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत आपराधिक धाराएं, विशेषकर ड्यूटी पर नशे के लिए धारा 172 और यात्रियों की सुरक्षा खतरे में डालने के लिए धारा 175, तभी लगाई जाती हैं जब नशे या लापरवाही के चलते कोई बड़ा हादसा हो जाए; जैसे ट्रेनों की टक्कर, पटरी से उतरना, या सिग्नल ओवरशूट (SPAD) जैसी घटना। ऐसे मामलों में स्थानीय पुलिस या रेलवे अधिकारी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के साथ आपराधिक अदालत में चार्जशीट पेश करते हैं।
विमानन क्षेत्र की जवाबदेही प्रणाली में ढांचागत खामियां रेलवे एक कदम आगे हैं।
इस नियामक खामी की गंभीरता को समझने के लिए विमानन क्षेत्र में होने वाले खतरों के भयावह पैमाने को देखना होगा। निजी गाड़ी चलाने वाला एक शराबी ड्राइवर कुछ यात्रियों या राहगीरों की जान जोखिम में डालता है। इसके उलट, ए320 (A320) या बोइंग 777 (B777) जैसे विमान की कमान संभालने वाला पायलट 180 से लेकर 350 से अधिक यात्रियों की जिंदगी सीधे अपने हाथ में रखता है। 30,000 फीट की ऊंचाई पर शरीर का सुस्त पड़ना, भ्रम की स्थिति बनना या सोचने-समझने में थोड़ी भी देरी किसी सुधार का मौका नहीं देती। नशे की हालत में हुई एक चूक सिर्फ हादसा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जनसंहार का कारण बनती है। हाल ही में गुजरात में हुए एयर इंडिया हादसे में हम यह तबाही देख चुके हैं।
सुरक्षा के इतने बड़े जोखिम के बावजूद भारतीय कानून व्यवस्था नशेड़ी वाहन चालक पर तो कहर ढाती है, लेकिन मदांध पायलट पर मेहरबान रहती है। जब कोई ड्राइवर मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 185 के तहत नशे में पकड़ा जाता है या BNS, 2023 के तहत लापरवाही से गाड़ी चलाता है, तो कानून की पूरी ताकत उस पर आजमाई जाती है। पुलिस तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज करती है, गाड़ी जब्त करती है और उसे महीनों से लेकर (गंभीर मामलों में) आजीवन कारावास तक की सजा दिलाने के लिए केस लड़ती है।
दूसरी ओर, जब कोई कमर्शियल पायलट उड़ान से पहले ब्रेथ-एनालाइज़र टेस्ट में फेल होता है या नशीले पदार्थों के सेवन का दोषी पाया जाता है, तो मामले को महज एक “प्रशासनिक विषय” मानकर निपटा दिया जाता है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) अपने नियमों (CAR) के तहत चरणबद्ध निलंबन लागू करता है: पहली बार पकड़े जाने पर 3 महीने के लिए उड़ान पर रोक (ग्राउंडिंग), दूसरी बार में 3 साल का बैन और तीसरी बार में लाइसेंस रद्द।
गौर करने वाली बात यह है कि आरोपी पायलट प्रशासनिक स्तर पर ग्राउंड रहता है, काउंसलिंग या सस्पेंशन की अवधि पूरी करता है और सजा खत्म होते ही दोबारा कॉकपिट में वापस लौट आता है। पिछले एक दशक में दर्जनों पायलटों के टेस्ट में फेल होने के बावजूद सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि नशे में प्लेन उड़ाने की कोशिश के लिए किसी भी पायलट को आपराधिक सजा नहीं हुई है।
इस व्यवस्था में खामियां और भी हैं, भारतीय न्याय संहिता, 2023 में नशे की हालत में कमर्शियल प्लेन उड़ाने या उड़ाने की कोशिश करने को अपराध घोषित करने वाली कोई अलग से सख्त धारा नहीं बनी है।
दूसरी समस्या है, एयरलाइंस कंपनी अपनी साख बचाने और कानूनी मुकदमों से बचने के लिए ऐसे मामलों को कंपनी का आंतरिक मामला मानकर दबा देती हैं। बाहरी न्यायिक हस्तक्षेप न होने के कारण एयरलाइंस आरोपी क्रू मेंबर्स की शिकायत पुलिस में दर्ज कराने से बचती हैं।
मौजूदा व्यवस्था में ज़मीन पर पकड़े गए पायलट के कृत्य को “सैकड़ों लोगों की जान खतरे में डालने की आपराधिक कोशिश” मानने के बजाय सिर्फ एक “सफल नियामक बचाव” मान लिया जाता है। चूंकि हादसे को उड़ने से पहले टाल दिया गया, इसलिए आपराधिक न्याय प्रणाली पूरे मामले से पल्ला झाड़ लेती है और सब कुछ डीoजीoसीoएo के विवेक पर छोड़ दिया जाता है।
जब तक हमारा आपराधिक कानून कॉकपिट में बैठे शराबी पायलट से भी वही सख्ती नहीं बरतेगा जो सड़क पर शराबी ड्राइवर या रेल पटरी पर लोको पायलट से बरती जाती है, तब तक “जीरो टॉलरेंस” का सिद्धांत सिर्फ कागजी बातें और प्रशासनिक निलंबन बनकर रह जाएगा, कोई ठोस कानूनी खौफ पैदा नहीं होगा।
के. विश्वदेव राव
पत्रकार





