
‘ये वासना का नहीं प्रेम का नतीजा…’, SC ने पॉक्सो के दोषी को किया बरी
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम के तहत 10 साल की सजा काट रहे एक व्यक्ति को अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए बरी कर दिया है।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक दुर्लभ फैसले में ऐसे व्यक्ति की दोषसिद्धि और सजा रद्द की, जिसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 6 के तहत दोषी पाया गया। यह फैसला पीड़िता से उसके बाद के विवाह और उनके स्थापित पारिवारिक जीवन को ध्यान में रखते हुए सुनाया गया। कोर्ट ने पाया कि आरोपी और पीड़िता के बीच प्रेम संबंध था, वासना नहीं, और वे अब एक खुशहाल दंपती हैं जिनका एक बच्चा भी है।
लड़का दोषी लेकिन नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए…
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि कानून के मुताबिक लड़का दोषी था, लेकिन कानून की सख्ती से नाइंसाफी नहीं होनी चाहिए। जजों ने फैसला सुनाया, ‘हम यह मानने को मजबूर हैं कि यह ऐसा मामला है जहां न्याय के लिए कानून को झुकना चाहिए।’
सुनवाई के दौरान पत्नी ने कोर्ट से कहा कि वह अपने पति और बच्चे के साथ एक खुशहाल, सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहती है। कोर्ट ने माना कि कानून के अनुसार, एक गंभीर अपराध के दोषी व्यक्ति के मामले में समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। लेकिन, पत्नी की करुणा और सहानुभूति की पुकार को नजरअंदाज करना न्याय के हित में नहीं होगा।
अपराध वासना का नहीं प्रेम का नतीजा…
कोर्ट ने यह भी कहा कि लड़के को जेल में रखने से परिवार, पीड़ित और बच्चे को नुकसान होगा। पॉस्को एक्ट के तहत आने वाले अपराध पर विचार करते हुए, हमने यह पाया कि यह अपराध वासना का नहीं, बल्कि प्यार का नतीजा था। खुद पीड़ित ने भी शांतिपूर्ण और स्थिर पारिवारिक जीवन जीने की इच्छा जताई है। वह अपने पति पर निर्भर है और नहीं चाहती कि उसके पति के माथे पर अपराधी होने का दाग लगे।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि आरोपी भविष्य में पत्नी और बच्चे का सम्मानपूर्वक भरण-पोषण करेगा और उन्हें नहीं छोड़ेगा। अगर उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया है। इससे पहले मई 2025 में भी सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून की मदद से पॉक्सो एक्ट में गिरफ्तार एक व्यक्ति को रिहा किया था।





