
इंदौर जल कांड के खिलाफ अनोखा विरोध… पूर्व फौजी सिर पर घड़ा लेकर पहुंचा कलेक्ट्रेट
UP News: मध्यप्रदेश के इंदौर में दूषित पानी पीने से 16 लोगों की मौत और सैकड़ों के बीमार होने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक हादसे के विरोध में उत्तर प्रदेश के बाघपत में एक पूर्व फौजी ने अनोखे तरीके से प्रशासन और सरकार का ध्यान खींचा।
बागपत निवासी पूर्व सैनिक सुभाष कश्यप सिर पर शुद्ध पानी से भरा घड़ा रखकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और परिसर की परिक्रमा करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। उनका यह कदम न केवल प्रतीकात्मक था, बल्कि साफ पानी के अधिकार को लेकर एक तीखा संदेश भी देता नजर आया।
घड़ा बना विरोध का प्रतीक
प्रदर्शन के दौरान सुभाष कश्यप ने मध्यप्रदेश सरकार के नाम एक ज्ञापन और शुद्ध पानी से भरा घड़ा कलेक्ट्रेट प्रभारी मनीष यादव को सौंपा। उन्होंने कहा कि यह घड़ा उन परिवारों की पीड़ा का प्रतीक है, जिन्होंने इंदौर में दूषित पानी के कारण अपनों को खो दिया।

पूर्व फौजी ने आरोप लगाया कि सरकारों ने पारंपरिक रूप से जल शुद्धिकरण का कार्य करने वाले कश्यप समाज की भूमिका को खत्म कर दिया, जिसका खामियाजा आज आम जनता भुगत रही है।
“जल व्यवस्था से छेड़छाड़ बनी मौत की वजह”
सुभाष कश्यप ने कहा कि जब तक कश्यप समाज जल शुद्धिकरण की जिम्मेदारी संभालता रहा, तब तक कभी इस तरह की घटनाएं सामने नहीं आईं।
उन्होंने कहा,
“आज आधुनिक व्यवस्था के नाम पर परंपरागत ज्ञान को दरकिनार कर दिया गया और नतीजा इंदौर जैसी त्रासदी के रूप में सामने आया।”
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हर घर से एक घड़ा शुद्ध पानी भेजने का दावा
पूर्व सैनिक ने इंदौर की घटना को बेहद दुखद बताते हुए कहा कि 16 मौतों के बाद भी सरकार का रवैया संवेदनहीन बना हुआ है। उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से इंदौर शुद्ध पानी भेजने का ऐलान करते हुए कहा कि बागपत जिले के हर घर से एक-एक घड़ा पानी भेजा जाएगा।

उनका कहना था कि यह कदम सरकार को यह याद दिलाने के लिए है कि जनता को सुरक्षित और शुद्ध पानी उपलब्ध कराना उसकी बुनियादी जिम्मेदारी है।
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प्रशासन को सौंपा ज्ञापन
कलेक्ट्रेट प्रभारी मनीष यादव ने ज्ञापन स्वीकार करते हुए आश्वासन दिया कि इसे संबंधित उच्च अधिकारियों और सरकार तक पहुंचाया जाएगा। प्रदर्शन के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में लोगों की भीड़ जुट गई और पूर्व फौजी के इस अनोखे विरोध की चर्चा होती रही।
यह प्रदर्शन न केवल इंदौर जल त्रासदी के प्रति आक्रोश को दर्शाता है, बल्कि देशभर में पेयजल सुरक्षा, सरकारी जवाबदेही और पारंपरिक जल संरक्षण व्यवस्था को लेकर एक नई बहस भी छेड़ता नजर आया।
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