US–Iran: मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ी अमेरिकी सैन्य ताकत, क्या ईरान पर हमला तय?

US-Iran Attack: मिडिल ईस्ट में हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई से पहले अपनी ताकत का बड़ा प्रदर्शन शुरू कर दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने एक और परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को मिडिल ईस्ट की ओर रवाना कर दिया है। इसके साथ ही अमेरिकी वायुसेना, ब्रिटेन और फ्रांस के लड़ाकू विमानों की गतिविधियां भी तेज हो गई हैं, जिससे यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या ईरान पर हमला अब टाला नहीं जा सकता?

एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती: बड़े हमले की तैयारी?
डिफेंस वेबसाइट द वॉर जोन की रिपोर्ट के अनुसार, जब भी मिडिल ईस्ट में किसी बड़े संकट के संकेत मिलते हैं, अमेरिका अपने सैन्य एसेट्स—जैसे कार्गो शिप्स, फाइटर जेट्स और एयरक्राफ्ट कैरियर्स—की तैनाती बढ़ा देता है। इस बार भी वैसा ही हो रहा है।

अमेरिका पहले ही अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को इस क्षेत्र में भेज चुका है, जो एक हफ्ते के भीतर मिडिल ईस्ट पहुंच जाएगा। इस कैरियर ग्रुप में शामिल हैं—

  • F-35C लाइटनिंग II
  • F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट
  • EA-18G ग्राउलर
  • E-2D हॉकआई
  • CMV-22B ऑस्प्रे
  • MH-60R/S सी हॉक हेलिकॉप्टर

इसके साथ चल रहे टिकोनडेरोगा क्लास मिसाइल क्रूजर और अर्ले बर्क क्लास डिस्ट्रॉयर बड़ी संख्या में क्रूज और गाइडेड मिसाइलों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल ईरान पर हमले या जवाबी कार्रवाई से रक्षा—दोनों में किया जा सकता है।

इसके अलावा, जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप के भी इस इलाके की ओर बढ़ने की खबरें हैं, हालांकि अमेरिकी नौसेना ने इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।

ट्रंप के संकेत और व्हाइट हाउस का रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही ईरान को लेकर सख्त बयान दे चुके हैं। हाल के दिनों में उन्होंने हमले के संकेत दिए थे, हालांकि ईरान द्वारा करीब 800 प्रदर्शनकारियों की फांसी पर रोक लगाए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने कहा कि फिलहाल हमला टाल दिया गया है।

लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह नरमी स्थायी नहीं है। पिछली बार भी ट्रंप ने ईरान पर कार्रवाई से पहले इसी तरह के नरम संकेत दिए थे, जिसके बाद अचानक सैन्य कदम उठाए गए थे।

अमेरिका की रणनीति
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी मिलिट्री प्लानर्स किसी लंबे युद्ध में फंसना नहीं चाहते। उनकी रणनीति यह हो सकती है कि एक ही बार में भीषण हमला कर ईरान की सैन्य क्षमता को पंगु बना दिया जाए। इसके संभावित विकल्पों में शामिल हैं—

  • इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) और बासिज पैरामिलिट्री फोर्स पर सर्जिकल स्ट्राइक
  • ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला
  • मिसाइल फैक्ट्रियों और अंडरग्राउंड सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना
  • ईरान के शीर्ष नेतृत्व पर टारगेटेड अटैक

हालांकि, इस तरह की कार्रवाई के बाद ईरान की जवाबी प्रतिक्रिया बेहद खतरनाक हो सकती है।

इजरायल की चिंता और नेतन्याहू का रुख
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप से ईरान पर हमला न करने का आग्रह किया है। वजह साफ है—पिछली झड़पों में ईरान की एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलें इजरायल तक पहुंच चुकी हैं।
अगर इस बार बड़ा हमला हुआ, तो ईरान इजरायल और मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकता है।

यूरोप और US एयरफोर्स की बढ़ी गतिविधि
अमेरिकी नौसेना के अलावा, US एयरफोर्स भी मिडिल ईस्ट में तेजी से एक्टिव हुई है। एक दर्जन से ज्यादा कार्गो जेट्स इस इलाके की ओर बढ़ते देखे गए हैं, जो सप्लाई चेन मजबूत करने के संकेत देते हैं।

ओपन-सोर्स फ्लाइट ट्रैकिंग के मुताबिक—

  • रॉयल एयर फोर्स (UK) के यूरोफाइटर टाइफून
  • एयरबस KC-2 वॉयजर एरियल रिफ्यूलिंग जेट
  • जॉर्डन के मुवफ्फाक अल-साल्टी एयर बेस के ऊपर RAF का MQ-9B ड्रोन

इसके अलावा, फ्रांस और जर्मनी के सैन्य विमानों की मौजूदगी भी बढ़ती दिख रही है, हालांकि इन देशों ने आधिकारिक बयान देने से इनकार किया है।

सबसे बड़ा सवाल: हमले के बाद ईरान को कौन संभालेगा?
डिफेंस एनालिस्ट टायलर रोगोवे ने चेतावनी दी है कि हमला करना एक बात है, लेकिन हमले के बाद हालात संभालना बिल्कुल अलग चुनौती होगी। अगर शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया और सत्ता ढह गई, तो ईरान में अराजकता फैल सकती है। उनका कहना है कि भले ही एयरक्राफ्ट कैरियर, 100 से ज्यादा फाइटर जेट्स और दर्जनों युद्धपोत एक विशाल सैन्य ताकत दिखाते हों, लेकिन किसी देश को स्थिर करना सिर्फ एयरस्ट्राइक से संभव नहीं होता।

फिलहाल, अमेरिका ने औपचारिक रूप से ईरान पर हमले की घोषणा नहीं की है, लेकिन सैन्य तैनाती, एयर मूवमेंट और राजनीतिक संकेत इस ओर इशारा कर रहे हैं कि हालात बेहद नाजुक हैं।
अगर हमला होता है, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरा मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की चपेट में आ सकता है।

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