परिसीमन की बहस: साउथ vs हिंदी… परिसीमन से कौन होगा मजबूत?

Delimitation: देश में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। भारत की संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण विधेयक के साथ परिसीमन का मुद्दा सामने आने के बाद विपक्ष ने इसके संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। चर्चा का केंद्र यह है कि क्या नए परिसीमन से दक्षिण भारतीय राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटेगा और हिंदी भाषी राज्यों को फायदा मिलेगा।

क्या है परिसीमन और क्यों है अहम?
परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण। भारत में आखिरी बार परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर ही स्थिर रखी गई थी। अब यदि सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 की जाती है, तो यह देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।

दक्षिण बनाम उत्तर: विवाद की जड़
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परिसीमन पूरी तरह वर्तमान जनसंख्या के आधार पर होता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान—को ज्यादा सीटें मिलेंगी।
इसके उलट, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए उनकी सीटों में अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी होगी।

यही कारण है कि दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि उनका “पॉलिटिकल प्रतिशत” या केंद्र की राजनीति में प्रभाव घट सकता है।

क्या सच में घटेगा दक्षिण का प्रभाव?
सीधे शब्दों में कहें तो:

  • सीटों की संख्या के लिहाज से दक्षिण का हिस्सा घट सकता है (कुल प्रतिशत कम हो सकता है)
  • लेकिन पूर्ण संख्या (absolute seats) में कमी जरूरी नहीं है, बल्कि कुछ बढ़ोतरी हो सकती है
  • असली बदलाव “प्रतिशत हिस्सेदारी” में होगा, जिससे केंद्र की सत्ता पर असर पड़ सकता है

हिंदी भाषी राज्यों को कितना फायदा?
उत्तर भारत के बड़े राज्यों को ज्यादा सीटें मिलने का मतलब है:

  • लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा
  • सरकार बनाने में उनकी भूमिका और निर्णायक हो सकती है
  • राष्ट्रीय राजनीति में “हिंदी बेल्ट” का प्रभाव मजबूत होगा

विपक्ष क्यों कर रहा विरोध?
विपक्ष का तर्क है कि:

  • जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया, उन्हें “सजा” मिल रही है
  • यह संघीय ढांचे (Federal Structure) के संतुलन को बिगाड़ सकता है
  • दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीतिक खाई बढ़ सकती है

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सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि परिसीमन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत पर आधारित है। यानी जहां आबादी ज्यादा है, वहां प्रतिनिधित्व भी ज्यादा होना चाहिए।

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महिला आरक्षण से जुड़ा पहलू
प्रस्तावित ढांचे में कुल सीटों का एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होगा। इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, लेकिन यह भी परिसीमन के बाद ही लागू होगा।

परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीतिक शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है। दक्षिणी राज्यों का “प्रतिशत प्रभाव” घटने की आशंका पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम परिसीमन किस आधार पर और किस फॉर्मूले से लागू किया जाता है।

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