शांति समझौते ने बदली तेल बाजार की तस्वीर, कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट…

Crude Oil Price Drops: पश्चिम एशिया में महीनों से जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इस घटनाक्रम ने न केवल वैश्विक शेयर बाजारों में उत्साह पैदा किया है, बल्कि भारत समेत तेल आयात पर निर्भर देशों में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में संभावित राहत की उम्मीद भी जगा दी है।

शांति समझौते के बाद धड़ाम हुए तेल के दाम
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम तथा शांति समझौते पर सहमति बन गई है। इसके साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने और ईरानी बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकेबंदी हटाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए हैं। इस घोषणा के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेज गिरावट देखने को मिली। ब्रेंट क्रूड करीब 84 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 81 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल गया, जो पिछले कई महीनों के निचले स्तरों में शामिल है।

क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। वैश्विक स्तर पर होने वाले कच्चे तेल के व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी जलमार्ग से गुजरता है। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण इस क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ा और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज में सामान्य स्थिति बहाल हो जाती है तो तेल आपूर्ति में सुधार होगा और बाजार में बना जोखिम प्रीमियम समाप्त होने लगेगा। यही कारण है कि समझौते की खबर आते ही निवेशकों ने तेल की बिकवाली शुरू कर दी।

भारत को कितना फायदा?
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। कम कीमतों पर तेल खरीदने से आयात बिल घटता है, रुपये पर दबाव कम होता है और सरकार को भी वित्तीय राहत मिलती है।

हालांकि पेट्रोल और डीजल के दामों में तत्काल कटौती की संभावना कम है। भारत में ईंधन की कीमतें केवल कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि इसमें टैक्स, परिवहन लागत, रिफाइनिंग खर्च और रुपये-डॉलर विनिमय दर भी अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों पर कीमतें घटाने का दबाव बढ़ सकता है।

शेयर बाजार में भी दिखा असर
तेल कीमतों में गिरावट की खबर का सकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिला। निवेशकों ने इसे वैश्विक आर्थिक स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम माना, जिसके चलते सेंसेक्स और निफ्टी में जोरदार बढ़त दर्ज की गई। तेल आयात करने वाली कंपनियों, एविएशन सेक्टर और ऑटो कंपनियों के शेयरों में विशेष तेजी देखी गई।

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क्या आगे और सस्ता हो सकता है कच्चा तेल?
विश्लेषकों का मानना है कि तेल बाजार की दिशा अब पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता कितनी मजबूती से लागू होता है। यदि युद्धविराम कायम रहता है और होर्मुज से तेल आपूर्ति सामान्य हो जाती है, तो कच्चे तेल की कीमतें और नीचे आ सकती हैं। हालांकि परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अभी भी कई दौर की बातचीत बाकी है। इसलिए बाजार में कुछ अनिश्चितता बनी रहेगी।

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आम लोगों के लिए क्या संकेत?
फिलहाल सबसे बड़ा संकेत यह है कि वैश्विक तेल बाजार में तनाव कम होने लगा है। यदि आने वाले हफ्तों में यही स्थिति बनी रहती है, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में राहत मिलने की संभावना मजबूत हो सकती है। हालांकि अंतिम फैसला तेल कंपनियों और सरकारी नीतियों पर निर्भर करेगा।

कुल मिलाकर, अमेरिका-ईरान शांति समझौते ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत दी है। कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट ने ईंधन महंगाई कम होने की उम्मीद जगाई है और करोड़ों उपभोक्ताओं की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या इसका फायदा जल्द ही पेट्रोल पंपों तक पहुंच पाएगा।

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