
राधा अष्टमी पर जानिए रहस्यमयी निधिवन का सच, जहाँ आज भी रास रचाते हैं राधा-कृष्ण
Radha Ashtami 2026: सनातन धर्म में राधा अष्टमी का पावन पर्व बड़े ही श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह व्रत श्रीराधा रानी के पावन प्राकट्य दिवस के रूप में प्रसिद्ध है।
मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से राधा रानी की पूजा करने और राधा अष्टमी व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और अक्षय पुण्य फल की प्राप्ति होती है। राधा अष्टमी के इस शुभ अवसर पर ब्रजभूमि और खासतौर पर वृंदावन के अलौकिक ‘निधिवन’ का महत्व और भी बढ़ जाता है।
निधिवन का अलौकिक रहस्य
वृंदावन का निधिवन अपने दामन में कई ऐसे अद्भुत रहस्य समेटे हुए है जिनके आगे आधुनिक विज्ञान भी नतमस्तक हो जाता है। ऐसी लोकमान्यता है कि हर रात को इस पवित्र वन में साक्षात श्रीकृष्ण अपनी प्रिय श्रीराधा रानी और गोपियों के साथ अलौकिक रास रचाते हैं। इसी वजह से शाम की महाआरती के बाद इस परिसर को पूरी तरह खाली कराकर बंद कर दिया जाता है। रात होते ही यहाँ इंसानों की मौजूदगी तो दूर, पशु-पक्षी भी इस परिसर को छोड़कर बाहर चले जाते हैं।
रंगमहल में रोज सजती है सेज
निधिवन परिसर में स्थित ‘रंग महल’ का संबंध सीधे राधा रानी और कन्हैया के विश्राम से जोड़ा जाता है। परंपरा के अनुसार प्रतिदिन रात को सोने से पहले रंगमहल में चंदन का एक सुंदर पलंग सजाया जाता है। पलंग के पास ही पीने के लिए जल से भरा लोटा, दातुन और पान रख दिया जाता है। हर सुबह जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, तो पलंग का बिस्तर अस्त-व्यस्त मिलता है, जल का पात्र खाली रहता है, दातुन चबाई हुई पाई जाती है और पान खाया हुआ मिलता है।
उलटे पेड़ और जोड़े में तुलसी के पौधे
निधिवन के प्राकृतिक सौंदर्य में भी एक अनूठा चमत्कार छिपा हुआ है। यहाँ उगे सभी पेड़ों की शाखाएं ऊपर आकाश की ओर जाने के बजाय नीचे जमीन की तरफ बढ़ती हैं। इसके अलावा, निधिवन के भीतर तुलसी का हर पौधा हमेशा जोड़े में ही पाया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि रात के समय यही तुलसी के पौधे गोपियों का रूप धारण कर लेते हैं और सुबह होते ही पुनः तुलसी के पौधे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस वन से तुलसी का एक पत्ता या लकड़ी भी ले जाना वर्जित माना जाता है।
बांकेबिहारी का प्राकट्य
यह पवित्र भूमि संगीत सम्राट तानसेन के गुरु और महान संत स्वामी हरिदास जी की साधना स्थली रही है। स्वामी हरिदास जी निधिवन में बैठकर अपनी वीणा की मधुर तान से श्रीराधा-कृष्ण की आराधना किया करते थे।
उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर इसी परिसर में स्थित विशाखा कुंड के समीप से श्री बांकेबिहारी जी की विग्रह मूर्ति प्रकट हुई थी। राधा अष्टमी के पावन पर्व पर श्रद्धालु निधिवन और बांकेबिहारी जी के दर्शन कर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं।





