‘भारत पर हमला हुआ तो…’ पाकिस्तान के दावे पर सऊदी एक्सपर्ट ने दिया बड़ा जवाब

Mecca Defence Pact: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते को लेकर दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिति पर चर्चा तेज हो गई है। पाकिस्तान में इस समझौते को बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। कुछ पाकिस्तानी विश्लेषकों और सोशल मीडिया यूजर्स का दावा है कि भविष्य में भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में सऊदी अरब और तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़े हो सकते हैं। हालांकि, सऊदी विशेषज्ञों का आकलन इससे काफी अलग है।

रिपोर्टों के मुताबिक, इस समझौते में यह प्रावधान बताया गया है कि किसी एक सदस्य देश के खिलाफ होने वाले हमले को सभी देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसे कई जगहों पर ‘मुस्लिम NATO’ तक कहा जा रहा है। लेकिन इस समझौते को भारत के खिलाफ किसी स्पष्ट सैन्य गठबंधन के रूप में देखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

पाकिस्तान में क्यों हो रहा समझौते का जश्न?
रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान में इसे अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत होने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि यदि भविष्य में भारत के साथ सैन्य टकराव होता है तो सऊदी अरब और तुर्की उसके समर्थन में सामने आ सकते हैं।

इस समझौते के सामूहिक सुरक्षा प्रावधान को लेकर पाकिस्तान में इसे बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है। इससे इस्लामाबाद को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

हालांकि, किसी रक्षा समझौते का अस्तित्व अपने आप यह साबित नहीं करता कि किसी संभावित भारत-पाकिस्तान युद्ध में सऊदी अरब या तुर्की सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेंगे।

सऊदी विशेषज्ञों का क्या कहना है?
सऊदी विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को भारत के खिलाफ खुली सैन्य प्रतिबद्धता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। मिडिल ईस्ट क्रॉनिकल की रिपोर्ट के हवाले से सामने आए आकलन में कहा गया है कि सऊदी अरब के पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते का मतलब यह नहीं है कि इस्लामाबाद को भविष्य में भारत के साथ संघर्ष की स्थिति में रियाद या अंकारा से किसी तरह की ‘खुली छूट’ मिल गई है।

सऊदी पक्ष से आने वाले बयानों को भी अपेक्षाकृत संयमित बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि रियाद भारत के साथ अपने मौजूदा रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों को किसी एक क्षेत्रीय रक्षा समझौते की वजह से कमजोर नहीं करना चाहेगा।

भारत-सऊदी रिश्ते भी हैं अहम
भारत और सऊदी अरब के बीच पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक, ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक क्षेत्रों में रिश्ते लगातार मजबूत हुए हैं। बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की भारत यात्राओं के दौरान दोनों देशों ने कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है। ऐसे में रियाद के लिए भारत के साथ संबंधों को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

यही वजह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को सीधे भारत विरोधी गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा।

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तुर्की की भूमिका पर भी नजर
इस समझौते में तुर्की की मौजूदगी इसे और महत्वपूर्ण बनाती है। तुर्की और पाकिस्तान के बीच पहले से ही रक्षा सहयोग और रणनीतिक रिश्ते मजबूत रहे हैं। भारत के साथ तुर्की के संबंधों में भी कई बार मतभेद सामने आए हैं।

पाकिस्तान के लिए तुर्की का समर्थन पहले से ही महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में रक्षा समझौते के बाद इस्लामाबाद की रणनीतिक स्थिति निश्चित तौर पर मजबूत हो सकती है। लेकिन सऊदी अरब की भूमिका को तुर्की के रुख के साथ पूरी तरह समान मानना जरूरी नहीं है।

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क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?
विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक, भारत के लिए इस समझौते को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे पाकिस्तान को अतिरिक्त कूटनीतिक और रक्षा सहयोग हासिल हो सकता है। भविष्य में पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं और रणनीतिक विकल्पों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत के खिलाफ किसी संभावित संघर्ष में सऊदी अरब और तुर्की स्वतः युद्ध में उतर जाएंगे। किसी भी सैन्य संकट में राजनीतिक परिस्थितियां, समझौते की शर्तें और संबंधित देशों के राष्ट्रीय हित महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

इसलिए फिलहाल ‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ को भारत के खिलाफ सीधे सैन्य गठबंधन के तौर पर देखना अतिशयोक्ति होगी। सऊदी विशेषज्ञों की ओर से भारत विरोधी नैरेटिव को खारिज किया जाना भी संकेत देता है कि रियाद पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने के बावजूद भारत के साथ अपने महत्वपूर्ण रिश्तों को बनाए रखना चाहता है।

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