लखनऊ सचिवालय में तैनाती का भ्रष्ट खेल बेनकाब, 30 से ज्यादा SO घूस के घेरे में

Lucknow News: राजधानी लखनऊ में तैनाती के नाम पर घूस के खेल का मामला सामने आया है। सचिवालय में 30 से ज्यादा अनुभाग अधिकारियों (SO) पर घूस देकर मनचाही पोस्टिंग पाने के आरोप हैं।

Lucknow News: यूपी की राजधानी लखनऊ स्थित सचिवालय में तैनाती को लेकर घूसखोरी और नियमों की अनदेखी का गंभीर मामला सामने आया है। सचिवालय प्रशासन विभाग ने 30 से अधिक SO को नोटिस जारी कर उनसे उनके ऊपर लगे आरोपों पर जवाब मांगा है। जवाब मिलने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। सूत्रों के मुताबिक, लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि सचिवालय की ट्रांसफर पॉलिसी को दरकिनार कर कुछ अधिकारियों को लगातार अहम और मलाईदार विभागों में तैनात किया जा रहा था। जबकि तय नीति के अनुसार सचिवालय के विभागों को तीन श्रेणियों (A, B और C) में विभाजित किया गया था और रोटेशन के आधार पर सभी कर्मचारियों की तैनाती होनी थी।

उच्च स्तर तक पहुंची थी शिकायत

सूत्रों का कहना है कि अनुभाग अधिकारियों की पोस्टिंग में घूसखोरी को लेकर शासन के उच्च स्तर पर शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसी शिकायती पत्र के आधार पर जांच और आवश्यक कार्रवाई के लिए मामला सचिवालय प्रशासन विभाग को भेजा गया। इसी क्रम में संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किए गए हैं, ताकि वे अपने ऊपर लगे आरोपों पर स्पष्टीकरण दे सकें।

हालांकि, कई मामलों में यह देखा गया कि कुछ अधिकारी नीति के विपरीत लगातार ‘ए’ श्रेणी के विभागों में ही बने रहे। अब इन्हीं तैनातियों को लेकर घूस के लेन-देन की आधिकारिक पड़ताल शुरू हो गई है।

प्रमुख सचिव का बयान

इस पूरे मामले पर सचिवालय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव मनीष चौहान ने कहा,

“कुछ शिकायतें प्राप्त हुई थीं। सभी संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा गया है।”

विजिलेंस जांच की उठी मांग

सचिवालय के एक समीक्षा अधिकारी ने इस मामले को बेहद गंभीर बताया है। उनका कहना है कि अगर तैनाती में घूसखोरी हुई है तो इससे शासन की पारदर्शिता और कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ता है। उन्होंने मांग की है कि इस मामले के साथ-साथ तबादला नीति के खिलाफ की गई सभी पोस्टिंगों की भी व्यापक जांच होनी चाहिए।

नोटिस जारी होने के बाद से सचिवालय का माहौल काफी गर्माया हुआ है। कई कर्मचारी नेताओं का कहना है कि सिर्फ लिखित जवाब लेकर मामले को रफा-दफा नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसकी विजिलेंस या किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

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