
‘राष्ट्र के नाम संदेश’ या चुनावी फायदा? PM मोदी के संबोधन को लेकर EC में शिकायत…
Action on PM Modi Speech: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। 700 से अधिक नागरिकों ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को शिकायत भेजकर आरोप लगाया है कि यह संबोधन आदर्श चुनाव आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन करता है।
शिकायतकर्ताओं में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं। उन्होंने 20 अप्रैल को मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजे गए पत्र में कई गंभीर मुद्दे उठाए हैं।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि 18 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी ने ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ दिया था। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह भाषण ऐसे समय प्रसारित हुआ जब चुनावी माहौल बना हुआ है और कई राज्यों में आचार संहिता लागू है।
उनका आरोप है कि इस संबोधन को दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित किया गया, जो कि सार्वजनिक धन से संचालित होते हैं।
शिकायतकर्ताओं की मुख्य आपत्तियां
पत्र में कहा गया है कि:
सरकारी मीडिया का उपयोग चुनावी समय में इस तरह करना सत्ताधारी दल को अनुचित लाभ पहुंचा सकता है।
इससे चुनावी मैदान में बराबरी का सिद्धांत प्रभावित होता है।
यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की भावना के खिलाफ है।
शिकायतकर्ताओं ने चुनाव आयोग से इस मामले की जांच करने और उचित कार्रवाई करने की मांग की है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।
EC से क्या मांग की गई?
शिकायत में आयोग से आग्रह किया गया है कि:
इस संबोधन की प्रकृति और समय की जांच की जाए
यह तय किया जाए कि क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन है
यदि उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जाए
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शिकायत करने वाले प्रमुख लोग कौन हैं?
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में समाज के कई जाने-माने लोग शामिल हैं, जैसे नजीब जंग (दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल), योगेंद्र यादव (सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता), जयती घोष (प्रसिद्ध अर्थशास्त्री), टी.एम. कृष्णा (जाने-माने संगीतकार और लेखक), ई.ए.एस. सरमा (पूर्व केंद्रीय सचिव) आदि। इनका कहना है कि चुनाव आयोग को चुनाव की पवित्रता बनाए रखने के लिए अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए और तुरंत कदम उठाने चाहिए।
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क्या कहता है कानून?
आदर्श चुनाव आचार संहिता के तहत चुनाव के दौरान सरकारी संसाधनों और मंचों का उपयोग किसी भी दल या नेता के प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता। हालांकि, प्रधानमंत्री या सरकार द्वारा दिए गए आधिकारिक संबोधनों को लेकर कई बार व्याख्या और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
नरेंद्र मोदी के संबोधन को लेकर उठे इस विवाद ने चुनावी निष्पक्षता और सरकारी संसाधनों के उपयोग पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अब नजर भारत निर्वाचन आयोग के फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि यह मामला आचार संहिता के दायरे में आता है या नहीं।
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