
मिसाइल नहीं, रनवे पर वार! ईरान के ‘डिबेसिफिकेशन’ ने अमेरिका की बढ़ाई टेंशन…
US Iran War: मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रह गया है। ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए अब अमेरिकी लड़ाकू विमानों को सीधे निशाना बनाने के बजाय उनके एयरबेस और रनवे को निष्क्रिय करने की नीति अपनाई है। सैन्य विशेषज्ञ इस रणनीति को “डिबेसिफिकेशन (Debasification)” या “ऑपरेशन रनवे” कह रहे हैं।
इस रणनीति का मकसद दुश्मन के विमानों को हवा में गिराना नहीं, बल्कि उन्हें उड़ान भरने और सुरक्षित उतरने की क्षमता से वंचित करना है। इससे अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य ताकत और ऑपरेशन की गति दोनों प्रभावित हो रही हैं। हाल के विश्लेषणों के अनुसार ईरान अमेरिकी सैन्य अभियानों को लंबा और महंगा बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका लगातार ईरानी सैन्य ठिकानों और रणनीतिक ढांचे पर हमले कर रहा है।
क्या है ‘ऑपरेशन रनवे’?
पारंपरिक हवाई युद्ध में किसी देश का लक्ष्य दुश्मन के लड़ाकू विमानों को मार गिराना होता है। लेकिन ईरान की नई रणनीति इससे अलग है।
इसमें मिसाइलों और ड्रोन के जरिए एयरबेस के महत्वपूर्ण हिस्सों पर हमला किया जाता है, जिनमें शामिल हैं—
- रनवे
- टैक्सीवे
- विमान हैंगर
- ईंधन भंडारण केंद्र
- रखरखाव सुविधाएं
यदि रनवे ही इस्तेमाल के लायक नहीं रहेगा तो अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भी उड़ान नहीं भर पाएंगे।
अमेरिका के सामने क्यों बढ़ी चुनौती?
रिपोर्टों के मुताबिक पहले अमेरिका के पास ईरान के खिलाफ अभियान चलाने के लिए क्षेत्र में लगभग 20 एयरबेस उपलब्ध थे। लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा, राजनीतिक परिस्थितियों और सहयोगी देशों की सीमाओं के कारण सक्रिय विकल्प अब काफी कम रह गए हैं। इससे अमेरिकी विमानों का दबाव कुछ चुनिंदा एयरबेस पर बढ़ गया है।
ऐसी स्थिति में यदि किसी एक बड़े एयरबेस का रनवे क्षतिग्रस्त हो जाए तो—
- उड़ान संचालन बाधित हो सकता है।
- विमानों की पार्किंग क्षमता घट जाती है।
- मरम्मत में समय लगता है।
- एक ही स्थान पर अधिक विमान होने से बड़े नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
क्यों असरदार मानी जा रही है यह रणनीति?
आधुनिक एयरबेस पर रनवे सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता है। किसी लड़ाकू विमान को नष्ट करना कठिन और महंगा होता है, जबकि रनवे पर कुछ सटीक मिसाइल हमले पूरे एयरबेस की क्षमता को घंटों या कई बार दिनों तक प्रभावित कर सकते हैं।
यही कारण है कि सैन्य विशेषज्ञ इसे कम लागत में अधिक रणनीतिक प्रभाव वाली नीति मानते हैं।
ड्रोन और मिसाइलों का बढ़ता इस्तेमाल
ईरान पिछले कुछ वर्षों में बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और लंबी दूरी के ड्रोन नेटवर्क को लगातार मजबूत करता रहा है। यही हथियार अब एयरबेस, रडार स्टेशन और सैन्य बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि वह भी जवाबी कार्रवाई में ईरान के मिसाइल लॉन्चर, कमांड सेंटर और तटीय सैन्य प्रतिष्ठानों पर लगातार हमले कर रहा है।
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ट्रंप प्रशासन की बढ़ी मुश्किल
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ाया है, लेकिन इसके साथ ही ईरान भी जवाबी रणनीति बदल चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिकी एयरबेस सीमित होते गए और उन पर लगातार खतरा बना रहा, तो सैन्य अभियानों की लागत, समय और जोखिम तीनों बढ़ सकते हैं।
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क्या बदल सकता है युद्ध का स्वरूप?
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के युद्धों में केवल लड़ाकू विमान या मिसाइलों की संख्या ही निर्णायक नहीं होगी, बल्कि किस देश के एयरबेस कितने सुरक्षित हैं यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
यदि रनवे और सैन्य बुनियादी ढांचे पर लगातार सफल हमले होते हैं, तो दुनिया की सबसे आधुनिक वायुसेना भी अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाएगी। यही वजह है कि ईरान की ‘ऑपरेशन रनवे’ रणनीति को अमेरिका के लिए नई रणनीतिक चुनौती माना जा रहा है।
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