
SIR से बदली बंगाल की सियासत! 90 लाख वोटर हटे, TMC-BJP दोनों परेशान…
Bengal Elections: पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने सियासी माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई कटौती ने न सिर्फ चुनावी गणित को प्रभावित किया है, बल्कि प्रमुख दलों—तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी—के लिए नई अनिश्चितताएं भी पैदा कर दी हैं।
क्या है पूरा मामला?
राज्य में SIR प्रक्रिया के तहत 90.83 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिससे कुल वोटरों की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गई है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब राज्य में चुनाव दो चरणों में होने हैं, और हर सीट का गणित बेहद अहम हो गया है।
किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा असर?
इस बड़े संशोधन का प्रभाव राज्य के उन इलाकों में अधिक देखा जा रहा है, जो लंबे समय से सत्ता की दिशा तय करते रहे हैं:
दक्षिण बंगाल और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र है। ये इलाके 2011 से तृणमूल कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। यहां मतदाता सूची में कटौती से पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
इन क्षेत्रों में मतुआ और शरणार्थी वोट बैंक का प्रभाव है, जहां 2019 के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत की थी। अब यहां भी वोटरों की संख्या में कमी से भाजपा की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
यह भी पढ़ें…
Bengal News: मस्जिद मुद्दे ने बदली चुनावी चाल, TMC के वोट बैंक पर खतरा!
2021 से कितनी अलग हैं परिस्थितियां?
इस बार का चुनाव 2021 के विधानसभा चुनाव से काफी अलग माना जा रहा है।
पहले जहां वोट बैंक लगभग स्थिर था, अब उसमें बड़ा बदलाव आ चुका है
कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम होता है, ऐसे में मतदाताओं की संख्या में गिरावट निर्णायक साबित हो सकती है
राजनीतिक दलों को अब नई रणनीति और नए समीकरण बनाने पड़ रहे हैं
राजनीतिक दलों की रणनीति
तृणमूल कांग्रेस अब अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने और नए मतदाताओं को जोड़ने पर जोर दे रही है
भारतीय जनता पार्टी उन क्षेत्रों में फोकस बढ़ा रही है, जहां उसका प्रभाव पहले से मजबूत रहा है
दोनों दल ग्राउंड कैडर और बूथ मैनेजमेंट को और मजबूत करने में जुटे हैं
यह भी पढ़ें…
Owaisi की एंट्री से गरमाया बंगाल, AIMIM-AJUP गठबंधन ने उतारे 12 प्रत्याशी
क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?
विशेषज्ञों का मानना है कि SIR के बाद बने हालात में कोई भी दल पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकता।
- यह बदलाव किसी एक पार्टी के पक्ष में स्पष्ट रूप से नहीं दिख रहा
- चुनावी मुकाबला और ज्यादा कड़ा और अनिश्चित हो गया है
- छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार भी इस स्थिति का फायदा उठा सकते हैं
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, SIR का असली प्रभाव सामने आएगा। अब सवाल यह उठता है की क्या यह बदलाव किसी एक दल को बढ़त दिलाएगा? या मुकाबला और ज्यादा टक्कर का हो जाएगा? इन सवालों के जवाब चुनाव परिणाम ही तय करेंगे, लेकिन इतना तय है कि SIR ने बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ जरूर ला दिया है।
यह भी पढ़ें…





