
सड़कें पिघल रहीं, रेल पटरियां मुड़ रहीं… फिर भी यूरोप में AC से परहेज क्यों…?
AC in Europe: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से इस समय यूरोप के कई देश भीषण गर्मी और हीटवेव का सामना कर रहे हैं। फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, पुर्तगाल और ग्रीस जैसे देशों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। कई जगहों पर गर्मी इतनी अधिक है कि सड़कें पिघलने लगी हैं, रेल पटरियों में फैलाव आने से ट्रेनों की रफ्तार कम करनी पड़ी है और बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसके बावजूद यूरोप के अधिकांश घरों, स्कूलों, कार्यालयों और यहां तक कि कई अस्पतालों में भी एयर कंडीशनर (AC) आज भी आम सुविधा नहीं है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब तापमान 45 डिग्री तक पहुंच रहा है, तब भी यूरोप के लोग एयर कंडीशनर से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? इसके पीछे इतिहास, जलवायु, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और भवन निर्माण से जुड़े कई महत्वपूर्ण कारण हैं।
ठंडी जलवायु के कारण कभी महसूस नहीं हुई AC की जरूरत
यूरोप का अधिकांश हिस्सा लंबे समय तक ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु वाला क्षेत्र रहा है। यहां सर्दियां लंबी और कड़ी होती थीं, जबकि गर्मियां अपेक्षाकृत छोटी और हल्की रहती थीं। इसी वजह से घरों और सार्वजनिक इमारतों के निर्माण में हीटिंग सिस्टम को प्राथमिकता दी गई, जबकि एयर कंडीशनिंग की आवश्यकता महसूस नहीं की गई।
दशकों तक वहां गर्मी इतनी तीव्र नहीं होती थी कि हर घर में AC लगाना जरूरी माना जाए। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।
ऐतिहासिक इमारतों में AC लगाना आसान नहीं
यूरोप के कई शहर अपनी ऐतिहासिक विरासत और सदियों पुराने भवनों के लिए प्रसिद्ध हैं। इन इमारतों को संरक्षित रखने के लिए सख्त नियम लागू हैं। कई स्थानों पर भवनों के बाहरी हिस्से में एयर कंडीशनर की यूनिट लगाना प्रतिबंधित या सीमित है, क्योंकि इससे ऐतिहासिक वास्तुकला प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा पुराने भवनों की संरचना ऐसी है कि उनमें आधुनिक एयर कंडीशनिंग सिस्टम लगाना तकनीकी रूप से जटिल और महंगा साबित होता है।
पर्यावरण संरक्षण को दी जाती है प्राथमिकता
यूरोप के अधिकांश देशों ने कार्बन उत्सर्जन कम करने और ऊर्जा बचाने को अपनी प्रमुख नीतियों में शामिल किया है। एयर कंडीशनर बिजली की अधिक खपत करते हैं और यदि बिजली का उत्पादन जीवाश्म ईंधन से होता है तो इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ सकता है।
इसी कारण कई लोग प्राकृतिक वेंटिलेशन, मोटे पर्दों, छायादार निर्माण, बेहतर इन्सुलेशन और ऊर्जा-कुशल तकनीकों को प्राथमिकता देते हैं। सरकारें भी ऊर्जा की बचत करने वाले भवनों को बढ़ावा देती हैं।
बिजली महंगी, इसलिए AC चलाना पड़ता है भारी
यूरोप के कई देशों में बिजली की कीमत दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक है। ऐसे में पूरे दिन एयर कंडीशनर चलाना आम परिवारों के लिए खर्चीला हो सकता है। यही कारण है कि लोग पंखे, प्राकृतिक हवा या सीमित समय के लिए कूलिंग उपकरणों का उपयोग करना अधिक पसंद करते हैं।
सांस्कृतिक सोच भी निभाती है भूमिका
यूरोप में लंबे समय से यह धारणा रही है कि मौसम के अनुसार जीवनशैली में बदलाव करना बेहतर है, बजाय हर परिस्थिति में मशीनों पर निर्भर रहने के। कई लोग मानते हैं कि थोड़ी गर्मी सहना सामान्य जीवन का हिस्सा है। हालांकि लगातार बढ़ती हीटवेव के कारण यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है और अब नए घरों व कार्यालयों में एयर कंडीशनिंग की मांग बढ़ने लगी है।
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जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यूरोप में हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं। इसके चलते सरकारें और शहरी योजनाकार भवन निर्माण के नए मानकों पर काम कर रहे हैं, जिनमें बेहतर ताप नियंत्रण, हरित भवन, ऊर्जा दक्ष कूलिंग सिस्टम और सार्वजनिक स्थानों पर गर्मी से बचाव की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
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बदल रहा है यूरोप का रुख
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यूरोप में एयर कंडीशनर की मांग तेजी से बढ़ सकती है। हालांकि वहां केवल पारंपरिक AC पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा दक्ष तकनीकों, हीट पंप, स्मार्ट कूलिंग सिस्टम और पर्यावरण-अनुकूल समाधानों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि बढ़ती गर्मी से राहत भी मिले और ऊर्जा की खपत तथा कार्बन उत्सर्जन भी नियंत्रित रहे।
यूरोप में एयर कंडीशनर का सीमित उपयोग केवल एक आदत या पसंद का विषय नहीं है। इसके पीछे दशकों पुरानी जलवायु, ऐतिहासिक भवनों की संरचना, पर्यावरण संरक्षण की नीतियां, महंगी बिजली और सांस्कृतिक सोच जैसे कई कारण जुड़े हुए हैं। लेकिन बदलती जलवायु और लगातार बढ़ती हीटवेव ने अब यूरोप को भी अपनी पारंपरिक सोच में बदलाव करने पर मजबूर कर दिया है। आने वाले वर्षों में वहां आधुनिक और ऊर्जा-कुशल कूलिंग तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
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