
‘कॉकरोचों से दूर रहें छात्र-युवा’, विजय सरकार ने क्यों वापस लिया अपना ही आदेश?
Tamil Nadu: तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय की सरकार ने छात्रों और युवाओं को राजनीतिक प्रदर्शनों से दूर रखने से जुड़े अपने ही आदेश को वापस ले लिया है। कॉलेजिएट शिक्षा विभाग ने बुधवार को अपना पिछला निर्देश रद्द कर दिया, जिसमें सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के छात्रों को कुछ राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल होने से रोकने के लिए कार्रवाई करने को कहा गया था।
क्या था सरकार का आदेश?
तमिलनाडु के कॉलेजिएट शिक्षा विभाग की ओर से 17 अगस्त 2026 को एक निर्देश जारी किया गया था। इसमें सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के प्रिंसिपलों को छात्रों और युवाओं को राजनीतिक प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल होने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा गया था।
इस निर्देश में खास तौर पर कॉकरोच जनता पार्टी और लेफ्ट पार्टियों की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शनों से छात्रों को दूर रखने की बात सामने आई थी। सरकार के निर्देश के बाद राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर विवाद शुरू हो गया।
कॉकरोच जनता पार्टी ने जताया विरोध
सरकार के आदेश का कॉकरोच जनता पार्टी ने कड़ा विरोध किया था। पार्टी की ओर से इसे छात्रों के लोकतांत्रिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंकुश लगाने वाला कदम बताया गया। पार्टी ने सरकार के इस निर्देश को गैर-संवैधानिक करार देते हुए सवाल उठाए थे।
विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने अपने फैसले की समीक्षा की और अब कॉलेजिएट शिक्षा विभाग ने पिछला आदेश वापस ले लिया है।
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बुधवार को वापस लिया गया निर्देश
कॉलेजिएट शिक्षा की संयुक्त निदेशक सिंथिया सेल्वी पी की ओर से मंगलवार को जारी आदेश में कहा गया कि विभाग द्वारा 17 अगस्त को जारी पिछला निर्देश वापस लिया जाता है। यह आदेश तमिलनाडु के सभी सरकारी आर्ट्स और साइंस कॉलेजों के प्रिंसिपलों को भेजा गया था।
इस तरह छात्रों को राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों से दूर रखने के लिए जारी किया गया निर्देश अब प्रभावी नहीं रहेगा।
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सरकार के यू-टर्न पर सियासत तेज
सरकार के अपने आदेश को वापस लेने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है। विपक्ष और राजनीतिक संगठनों की ओर से सरकार के पहले आदेश पर सवाल उठाए जा रहे थे। अब आदेश वापस लिए जाने को सरकार के दबाव में आने के तौर पर भी देखा जा रहा है।
हालांकि, सरकार की ओर से आदेश वापस लेने के पीछे विस्तृत कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है। ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि आखिर 17 अगस्त को जारी निर्देश को महज कुछ दिनों के भीतर वापस लेने की जरूरत क्यों पड़ी।
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