
गैर-निर्वाचित मंत्री पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, बिहार सरकार से मांगा कानूनी जवाब…
Bihar News: बिहार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम सवाल उठाया। शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार से पूछा कि विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने बिना कोई व्यक्ति कुल मिलाकर छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। अदालत ने इसे संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न बताते हुए राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी।
यह मामला उस जनहित याचिका पर आधारित है, जिसमें दीपक प्रकाश के दोबारा मंत्री बनाए जाने को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई गैर-निर्वाचित व्यक्ति अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है। यदि वह इस अवधि के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं बनता, तो उसे मंत्री पद छोड़ना होता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दो अलग-अलग कार्यकालों को जोड़ने पर दीपक प्रकाश छह महीने से अधिक समय तक मंत्री रहे, जबकि वे अब भी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह पूरी तरह कानून और संविधान की व्याख्या का मामला है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को बताना होगा कि बिना निर्वाचित हुए कोई मंत्री छह महीने से अधिक समय तक अपने पद पर कैसे बना रह सकता है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द सुनवाई का निर्णय लिया और 4 अगस्त की तारीख तय कर दी।
क्या है संवैधानिक प्रावधान?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164(4) कहता है कि यदि किसी ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाया जाता है जो राज्य विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर वह मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार खो देता है। इसी प्रावधान की व्याख्या इस मामले का मुख्य कानूनी मुद्दा बन गई है।
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पुनर्नियुक्ति पर क्यों उठे सवाल?
इस मामले की विशेषता यह है कि दीपक प्रकाश लगातार छह महीने तक मंत्री नहीं रहे। वे पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में लगभग चार महीने 26 दिन मंत्री रहे। सरकार बदलने के बाद कुछ अंतराल के पश्चात उन्हें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली नई सरकार में फिर से मंत्री बना दिया गया। अब दोनों कार्यकालों को जोड़ने पर उनकी कुल अवधि छह महीने से अधिक हो गई है। इसी आधार पर याचिका में उनकी पुनर्नियुक्ति को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिका में कहा गया है कि संविधान में दी गई छह महीने की छूट केवल एक सीमित अवसर है, जिसका उद्देश्य गैर-निर्वाचित मंत्री को जल्द से जल्द सदन का सदस्य बनने का मौका देना है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार बदलने या दोबारा शपथ दिलाने के जरिए इस अवधि को फिर से शुरू नहीं किया जा सकता। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया गया है।
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4 अगस्त की सुनवाई पर रहेगी नजर
अब इस मामले पर सभी की निगाहें 4 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 164(4) की नई व्याख्या करता है, तो उसका असर केवल बिहार ही नहीं बल्कि भविष्य में अन्य राज्यों में गैर-निर्वाचित मंत्रियों की नियुक्तियों पर भी पड़ सकता है। यह फैसला संवैधानिक व्यवस्था और मंत्री पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
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