
आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त सुनवाई… शेल्टर और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी उजागर
Stray Dogs Court Hearing: देशभर में बढ़ते आवारा कुत्तों के हमलों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार दूसरे दिन भी ढाई घंटे तक गहन सुनवाई हुई। अदालत ने साफ संकेत दिए कि यह मामला केवल पशु अधिकारों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा, प्रशासनिक जिम्मेदारी और बुनियादी ढांचे की भारी कमी से भी जुड़ा है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कुत्तों के व्यवहार, एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों, शेल्टर होम की स्थिति और राज्यों की तैयारियों पर तीखे सवाल खड़े किए।
‘डर पहचान लेते हैं कुत्ते’ — जस्टिस नाथ की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस नाथ ने कुत्तों के व्यवहार को लेकर व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि कुत्ते यह पहचान लेते हैं कि कौन व्यक्ति उनसे डर रहा है और ऐसे मामलों में हमले की संभावना बढ़ जाती है। जब इस पर एक वकील ने असहमति जताई, तो जस्टिस नाथ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह बात वह अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहे हैं।
अदालत की यह टिप्पणी सुनवाई के सबसे चर्चित बिंदुओं में रही, जिस पर कोर्टरूम में मौजूद कई वकीलों और याचिकाकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी देखने को मिली।
देश में शेल्टर होम का संकट, इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग न के बराबर
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि राज्यों द्वारा दिए गए आंकड़ों में यह स्पष्ट नहीं है कि नगरपालिकाओं या सरकारों की ओर से कितने डॉग शेल्टर संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि पूरे देश में सिर्फ 5 सरकारी शेल्टर हैं, जो मुख्य रूप से बीमार और घायल कुत्तों के लिए हैं।
इन शेल्टरों में प्रत्येक की क्षमता लगभग 100 कुत्तों की है, जबकि बड़े शहरों में आवारा कुत्तों की संख्या लाखों में है। वकील ने कहा कि जब शेल्टर के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा ही मौजूद नहीं है, तो कोर्ट के आदेशों को जमीनी स्तर पर लागू करना लगभग असंभव हो जाता है।
कुत्तों को हटाने पर विवाद: चूहे बढ़ेंगे या सुरक्षा सुधरेगी?
एनिमल वेलफेयर की ओर से पेश वकीलों ने कुत्तों को हटाने या शेल्टर में भेजने पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि यदि कुत्तों को अचानक हटाया गया, तो चूहों की आबादी तेजी से बढ़ेगी, जिससे बीमारियों का खतरा और बढ़ सकता है।
इस पर कोर्ट ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा— “तो क्या हमें बिल्लियां ले आनी चाहिए?” हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने सभी कुत्तों को सड़कों से हटाने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि नियमों के तहत संतुलित और मानवीय समाधान पर जोर दिया है।
रिहायशी इलाकों तक आदेश लागू करने की मांग
कुत्तों को हटाने के पक्ष में खड़े वकीलों ने कहा कि अदालत का आदेश सिर्फ स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे रिहायशी इलाकों में भी लागू किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि कुत्तों की काउंसलिंग संभव नहीं है, लेकिन उनकी देखभाल करने वाले लोगों या तथाकथित मालिकों को जरूर समझाया जा सकता है।
वकीलों ने यह भी कहा कि ABC नियमों का उद्देश्य कुत्तों की संख्या को धीरे-धीरे नियंत्रित करना है, न कि उसे बढ़ावा देना।
कुत्तों की गिनती और माइक्रो-चिपिंग का सुझाव
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि देश में आवारा कुत्तों की आखिरी गिनती वर्ष 2009 में हुई थी। केवल दिल्ली में उस समय करीब 5.6 लाख आवारा कुत्ते बताए गए थे। कोर्ट के समक्ष सवाल रखा गया कि जब सटीक आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं, तो मॉनिटरिंग और मैनेजमेंट कैसे संभव है।
इसी क्रम में कुत्तों की माइक्रो-चिपिंग का सुझाव भी दिया गया। वकीलों ने बताया कि कुछ शहरों में यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिससे कुत्तों की पहचान, वैक्सीनेशन और नसबंदी का रिकॉर्ड रखा जा सकता है।
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याचिकाओं पर फीस और कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान उस आदेश पर भी बहस हुई, जिसमें याचिका दायर करने वाले NGO और डॉग लवर्स के लिए एक निश्चित फीस तय की गई है। इस पर आपत्ति जताते हुए कहा गया कि इससे लोगों को कोर्ट आने में हिचक हो सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि यह शर्त नहीं होती, तो अदालत में याचिकाओं का अंबार लग जाता। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि न्यायिक समय का दुरुपयोग रोकना जरूरी है।
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अगली सुनवाई
यह मामला पिछले सात महीनों में छह बार सुना जा चुका है और अब इसकी अगली सुनवाई 9 जनवरी को तय की गई है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह मुद्दा केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस नीति, संसाधनों और प्रशासनिक जिम्मेदारी से हल किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले समय में आवारा कुत्तों के प्रबंधन, ABC नियमों के सख्त पालन और शेल्टर इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को लेकर सरकारों पर दबाव बढ़ सकता है।
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